भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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५२० फलदीपिका राशि हो तो यह सब शुभ फल होते हैं । यदि पाप राशि हो तो अशुभ फल । पाप राशि होने के साथ-साथ यदि चर राशि हो तो जातक पदच्युत हो जाता है । (६) जन्म लग्न से छठे घर में पाप राशि हो तो उसकी दशा में अग्नि का भय, चोर, शत्रु, विष, राजा से पीड़ा, स्थान नाश, महाभय, प्रमेह, गुल्म, पाण्डु, संग्रहणी, क्षय, आदि रोग, अयश (बदनामी), बन्धन (जेल या गिरफ्तारी), ऋण (कर्ज़ा), दरिद्रता, पीड़ा आदि कष्ट फल । यदि शुभ राशि हो तो मिश्र फल होता है । (७) यदि विचारणीय राशि लग्न से सातवें घर में हो तो विवाह (यदि विवाह की उम्र हो और जातक अविवाहित हो) स्त्री सुख (स्त्री की कुंडली में पति सुख) पुत्र सुख, उत्तम भोजन, खेती बाड़ी में वृद्धि, साझेदारी में रोज़गार (व्यापार), यश, राजा से सम्मान । यदि शुभ राशि हो, शुभ ग्रह युत हो तो अवश्य ही यह सब फल होते हैं । (८) यदि राशि जन्म लग्न से अष्टम हो तो धन हानि, महान् दुःख, स्थाननाश, बन्धुनाश, गुह्य भागों में या पेट में रोग, शत्रु भय, दरिद्रता, अन्न का अभाव या अन्न में अरुचि—यदि पाप राशि हो, पाप ग्रह उसमें बैठा हो तो यह अनिष्ट फल अवश्य होते हैं । (९) यदि विचारणीय राशि लग्न से नवें घर में हो तो शुभ समय जाता है; पुत्र, स्त्री, मित्र आदि का सुख, धन लाभ अच्छे कार्यों में सिद्धि, धार्मिक कृत्य, ऊंची श्रेणी के लोगों से सम्पर्क । यदि शुभ राशि हो तो सब कार्यों में सफलता आदि शुभ फल प्राप्त होता है । यदि पाप राशि हो तो उलटा फल होता है । (१०) जिस राशि की दशा का फल विचार कर रहे हैं वह लग्न से दशम हो तो उच्च पदवी की प्राप्ति, राजा की कृपा, यश, स्त्री, पुत्र और अपने बन्धुओं से सत्संग, महान् उत्सव, हुकूमत, शरीर