भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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बाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ५२१ सुख (उत्तम स्वास्थ्य) अच्छी गोष्ठी (सोसाइटी) में समय व्यतीत होना, ऐश्वर्य, अच्छे और बड़े कामों में सफलता आदि शुभ फल होते हैं । (११) यदि राशि लग्न से ग्यारहवें घर में हो तो धन प्राप्ति, आरोग्य, नवीन और विचित्र वस्तुओं का लाभ, फ़र्नीचर, कालीन, सोफा आदि, स्त्री, पुत्र, बन्धुओं से प्रसन्नता, जो रुपया उधार दिया गया हो उसकी प्राप्ति, राजा से प्रेम, महान् आदमियों का सम्पर्क आदि (शुभ राशि हो तो) शुभ फल होते हैं । (१२) यदि लग्न से बारहवें घर में राशि हो तो शरीर पीड़ा, अपने पद से अलग हो जाना (नौकरी छूटनी), चोर, अग्नि का भय, राजा का प्रकोप, राजा से पीड़ा, स्त्री कष्ट, पुत्र सम्बन्धी चिन्ता, आलस्य, जो उद्योग किया जाय उसमें असफलता, कर्म विकलता (अर्थात् जो कार्य हाथ में लिया हो उसमें परेशानी या काम न मिलने से परेशानी) आदि (यदि पाप राशि या पाप ग्रह से युत राशि हो तो) अशुभ फल होते हैं । (१३) ऊपर जो लग्न से गिनने पर—जिस भाव में राशि हो उसके अनुसार जो फल बतलाया गया है उसमें यह अवश्य ध्यान में रखना चाहिये कि उस राशि का स्वामी कितना बलवान् है । यदि राशि का स्वामी बलवान् हो अपनी उच्च राशि, मित्र राशि, अपने नवांश आदि वर्गों में हो, मित्र के साथ बैठा हो, उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो शुभ फल होता है । यदि राशि का स्वामी बलहीन हो, नीच या शत्रु की राशि में हो, अस्त हो, पापग्रह या अशुभ ग्रहों से देखा जाता हो, छठे, आठवें या बारहवें घर में बैठा हो तो कष्ट फल होता है अर्थात् जिस राशि का स्वामी ऐसी दुःस्थिति में जन्म कुंडली में है—उस राशि का अनिष्ट फल होता है । यदि राशि का फल अनिष्ट है किन्तु उसका स्वामी विशेष बलवान है तो परिणामतः शुभ फल ही होता है । दोनों (राशि