फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२२ फलदीपिका और राशीश) शुभ और बलवान् हों तो बहुत अधिक शुभ फल होगा। दोनों पाप युक्त, निर्बल हों तो परिणाम बहुत अनिष्ट होगा। राशि शुभ भी हो किन्तु उसका स्वामी निर्बल हो तो परिणामतः निकृष्ट फल ही होगा। अर्थात् राशि और स्वामी दोनों के विचार में स्वामी की ही प्रधानता है। किन्तु मान लीजिये मिथुन पापाक्रान्त पापदृष्ट है और कन्या राशि शुभाक्रान्त शुभ दृष्ट है—दोनों का स्वामी बुध ही है। तो मिथुन-बुध की दशा निकृष्ट फल करेगी। कन्या-बुध की दशा उत्तम जावेगी। (१४) जिस राशि का विचार किया जा रहा है वह यदि चर राशि हो, उसका स्वामी चर राशि, चर नवांश में है तो जातक विदेश जावेगा। यदि ऊपर जो ३ चर लक्षण बताये गये हैं (चर राशि, राशीश चर में, राशीश चर नवांश में) इनमें कोई चर और कोई स्थिर में हों तो तारतम्य से फल कहना चाहिये। (१५) संज्ञाध्याय में या कर्माजीवाध्याय में (देखिये बृहज्जातक) या ग्रहों के भिन्न-भिन्न राशियों या भावों में रहने के जो फल बताये गये हैं, राजयोग के या चन्द्रमा से गिनने पर (चन्द्रराशि से) कौन सा ग्रह कहाँ बैठ कर क्या योग बनाता है—उसका क्या फल है; दो ग्रहों या तीन ग्रहों के योग से क्या फल होते हैं आदि का विचार काल चक्रदशा फल बताते समय ध्यान में रखना चाहिये क्योंकि जब किसी का फल कह रहे हों तो उन सब योगों का फल भी (यदि राशि या राशीश उन योगों से सम्बद्ध हैं) उस राशि की दशा में होगा। देह-जीव फल ऊपर लग्न से विचारणीय राशि कहाँ है—इस आधार से उस राशि की दशा कैसी होगी यह बताया है। अब देह और जीव राशियों