भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 527, कुल 684 में से

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पृष्ठ 527

५२६ फलदीपिका छः गतियाँ ऐसी हैं जो क्रम का उल्लंघन करती हैं। मेष, वृष, मिथुन ....इस प्रकार क्रम से राशियों की दशा हो या उत्क्रम उलटा (उलटी गति) मीन, कुंभ, मकर आदि हो तो उसमें कोई विशेष बात नहीं। किन्तु मेष से उछलकर धनु में या धनु से उछलकर मेष में जाना या वृश्चिक से छलांग मार का मीन में जाना या मीन से छलांग मारकर वृश्चिक में आना या एक राशि कूदकर मिथुन से बुध या कर्क से कन्या में जाना या एक राशि कूदकर सिंह से मिथुन में जाना, ऐसी दशाओं के प्रारम्भ में प्रायः कष्ट होता है। कालचक्रदशा की काफी व्याख्या ऊपर की जा चुकी है। अब १४ श्लोकों के आगे के श्लोक अन्य प्रकार की दशा, कितने वर्ष की होती है आदि वर्णन करते हैं। इसलिये अब १५वें श्लोक की व्याख्या की जाती है। उत्पन्न आधान और क्षेम महादशाएँ महादशासु यत्फलं प्रकीर्तितं मया पुरा। तदेव योजयेद् बुधो दशासु चैवमादिषु ॥१५॥ महादशाओं के विचार जो अन्य महादशाओं के लिये बताये गये हैं वह "उत्पन्न" महादशा, 'क्षेम' महादशा और "आधान महादशा" में भी लागू करने चाहियें ॥१५॥ जन्मर्क्षात्परतस्तु पञ्चमभवाऽथोत्पन्नसंज्ञा दशा स्यादाधानदशाऽप्यतोऽष्टमभवात् क्षेमान्महाख्या दशा। आसांमेव दशावसानसमये मृत्युप्रदा स्यान्नृणां स्वल्पानल्पसमायुषां त्रिवधपञ्चैकर्शदायान्तिमे ॥१६॥

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