फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ५२५ (६) शुक्र रति, लाभ, सुख, विविध प्रकार के सुन्दर, वस्त्र, आभूषण, पशु, सवारी रत्न, स्त्रियों का सुख, भोग, गायन, दोस्तों की गोष्ठी (सोसाइटी), प्रताप वृद्धि, उत्तम यश आदि शुभ फल देता है । (७) शनि कलह, बीमारी (शारीरक पीड़ा) मृत्यु, बन्धुओं को कष्ट, बन्धुओं से पीड़ा, अग्नि, शत्रु, भूत, पिशाच आदि का भय, विष से कष्ट, मानहानि, धननाश, स्त्री कष्ट, पुत्र कष्ट, घर, खेती, व्यापार गौ आदि पशुओं का विनाश उत्पन्न करता है ओर अभिमान के कारण मनुष्य दुःखी रहता है । (८) राहु शरीर में पीड़ा, व्यर्थ घूमना, बन्धु कष्ट, लकवे आदि की बीमारी, राजा से भय उत्पन्न करता है । (९) केतु चोर, अग्नि से पीड़ा, खून बहना, दरिद्रता, बन्धुनाश स्थान नाश आदि दुष्ट फल करता है । यह ग्रहों के नैसर्गिक गुण हैं । जन्म कुंडली जितनी बलवान् होगी और विचारणीय राशि जितनी बलवान् होगी तथा विचारणीय राशि का स्वामी शुभग्रह जितना बलवान् होगा उतना अधिक शुभ फल उसका होगा । जन्म कुंडली जितनी कमज़ोर होगी—उसमें जितने अधिक दुर्योंग पड़े होंगे—विचारणीय राशि जितनी कमज़ोर, पापक्रान्त, पाप दृष्ट होगी, उसका स्वामी जितना कमज़ोर होगा, उतना ही कष्ट फल, पापग्रह की दशा का अधिक होगा । विविध गतियाँ अब केवल एक विषय और समझाकर यह कालचक्र दशा का प्रकरण समाप्त किया जाता है । इसमें सब राशियों की दशा क्रम से नहीं है—(i) मीन से वृश्चिक (ii) कन्या से कर्क (iii) सिंह से मिथुन (iv) धनु से मेष (v) वृश्चिक से मीन (vi) मेष से धनु