फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२८ फलदीपिका अंशदशा लिप्तीकृत्य भजेद् ग्रहं खखजिनैस्तच्छिष्टमायुष्कला आशाखाशिवहृताब्दमासदिवसाः सत्योदितेऽंशायुषि । वक्रिण्युच्चगते त्रिसङ्गुणमिदं स्वांशत्रिभागोत्तमे द्विघ्नं नीचगतेऽर्धमप्यथ दलं मौढ्ये सितार्कौ विना ॥१८॥ प्रत्येक ग्रह की राशि, अंश, कला के कला बनाकर २४०० से भाग दीजिये । जो शेष रहे उतनी आयुष्कला वह ग्रह प्रदान करता है । इन आयुष्कलाओं को २०० से भाग दीजिये । लब्धि = वर्ष । शेष को १२ से गुणा कर २०० का भाग दीजिये । लब्धि = मास । शेष को ३० से गुणाकर २०० का भाग दीजिये । लब्धि = दिन । यह सत्याचार्य का मत है । यदि ग्रह उच्च राशि में हो या वक्री हो तो उसके प्रदत्त जो वर्ष, मास, दिन आवें उनको तिगुना कर लेना चाहिये । यदि ग्रह स्वनवांश, स्वद्रेष्काण या वर्गोत्तम हो तो उसके प्रदत्त जितने वर्ष, मास, दिन आवें उनको दुगुना करना चाहिये । यदि ग्रह नीच राशि में हो या अस्त हो तो उसके दिये हुए वर्ष, मास, दिन को आधा कर दीजिये । लेकिन यह अस्तंगत ग्रह की दशा को आधी करने की प्रक्रिया शुक्र और शनि को लागू नहीं होती ॥१८॥ सर्वाद्धं त्रिकृतेषुषण्मितलवह्लासोऽसतामुत्क्रमा- द्विःफात्सत्सु दलं तदा हरति बल्येको बहुष्वेकभे । त्र्यंशोनं रिपुभे विना क्षितिसुतं सत्योपदेशे दशा लग्नस्यांशसमा बलिन्युदयभेऽस्यात्रापि तुल्यापि च ॥१९॥ यदि पापग्रह बारहवें घर में हो तो उसकी प्रदत्त आयु पूरी कम कर दी जाती है; यदि ग्यारहवें घर में हो तो १/२ कम कीजिये;