फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ५२९ दसवें घर में हो तो १/३ कम करें; नवें घर में हो तो १/४ कम करें; आठवें घर में हो तो १/५ कम करे, सातवें घर में हो तो १/६ कम करें । यदि शुभग्रह इसी प्रकार १२वें, ११वें, १०वें, ९वें, ८वें, या ७वें घर में हो तो पापग्रह होता तो जितनी आयु कम करते उसका आधा भाग कम कीजिये । यदि एक से अधिक ग्रह सातवें से १२वें-इन छः भावों में से किसी में हो तो केवल जो सबसे अधिक बली हो उसी की प्रदत्त आयु में कमी करते हैं—अन्य ग्रहों की प्रदत्त आयु में कमी नहीं करते । मंगल को छोड़कर अन्य ग्रह यदि शत्रु राशि में हों तो उनकी प्रदत्त आयु में तिहाई (१/३) कम कर देते हैं । सत्याचार्य का मत है कि—जितने नवांश लग्न में उदित हों उतनी आयु लग्न की होती है । चाहे लग्न बलवान् हो या निर्बल यही नियम लागू होता है । सत्योपदेशो वरमत्र किन्तु कुर्वन्त्ययोग्यं बहुवर्गणाभिः । आचार्यकं त्वत्र बहुघ्नतायाम् एके तु यद्भू रि तदेव कार्यम् ॥२०॥ मय या जीव शर्मा के बताये गये नियमों की अपेक्षा सत्याचार्य का क्रम श्रेष्ठ है । किन्तु अनेक प्रकार के ह्रास (कम करने या घटाने) के नियम ऊपर बताये गये हैं । जब कई प्रकार के ह्रास प्राप्त हों तो क्या सब प्रकार के ह्रास करने ? इस विषय में कहते हैं :— (१) जब कई प्रकार के ह्रास प्राप्त हों (जैसे १२ से ७वें स्थान तक १२, ११, १०, ९, ८, ७ इन स्थानों में स्थित, नीच राशि गत स्थिति, शत्रु राशि स्थिति, अस्तंगत होना—इन प्रत्येक में