फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 531, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें५३० फलदीपिका कम करना बताया गया तो जिस परिस्थिति (नियम) में सबसे अधिक कम करना बताया गया है केवल वही नियम लागू करना। (२) इसी प्रकार उच्च या वक्र आदि में 'वृद्धि' की जाती है। इसलिये ऐसी स्थिति में भी केवल एक 'वृद्धि' करना—वही एक नियम लागू करना जिसमें सबसे अधिक 'वृद्धि' लागू होती हो ॥ २० ॥ पिण्डायुर्दशा धेयं शूर शके श्रियं स्मय परे निद्राः समा भास्करात् पिण्डाख्यायुषि पूर्ववच्च हरणं सर्वं विदध्यादिह । लग्ने पापिनि भं विनोदयलवैर्निघ्नं नताङ्गैर्हतं त्याज्यं सौम्यनिरीक्षितेऽर्धमृणमत्रायुष्यभिज्ञा विदुः ॥२१॥ सूर्य आदि ग्रह यदि अपनी उच्च राशि में परमोच्च अंश पर हों तो प्रत्येक ग्रह के निम्नलिखित वर्ष होते हैं : सूर्य १९, चन्द्रमा २५, मंगल १५, बुध १२, बृहस्पति १५, शुक्र २१ तथा शनि २० वर्ष । यदि नीच राशि—परम नीच अंश में हो तो ० (कुछ नहीं) । मध्य में अनुपात से लगाना । जो ह्रास तथा वृद्धि के नियम अंशायु के लिये बताये गये हैं, वे इस पिंडायु में भी लागू करना । यदि कोई क्रूर ग्रह लग्न में हो तो जितने अंश कला लग्न के हों उनकी कला बना लीजिये (राशि के अंश कला नहीं बनाये जाते—केवल अंश, कला की कला बनायी जाती हैं) । इनका, जो आयु ग्रह प्रदत्त आयुओं का जोड़ आवे—उससे गुणा कर ३६० का भाग दीजिये । जो भजनफल आवे उसको पूर्ण आयु में घटा दीजिये । यदि लग्न में शुभ ग्रह हो तो पापग्रह होने से जितना घटाते उससे आधा घटाइये । ऐसा विद्वानों का मत है ॥२१॥