फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ५३१ लग्नदशांशसमां बलवत्यंशे वदन्ति पैण्डारुये । बलयुक्तं यदि लग्नं राशिसमैवात्र नांशोत्या ॥२२॥ पिण्डायुर्दाय में—यदि लग्न नवांश बली हो तो (i) लग्न प्रदत्त आयु उतनी होती है जितने लग्न नवांश उदित हों । यदि लग्न राशि बलवान् हो तो लग्न दत्त आयु उतने लग्न संख्या के हिसाब से होती है—मेष लग्न १ वर्ष, वृष लग्न २ वर्ष इत्यादि । हरणं नीचेऽर्द्धमृणं स्यात्पूर्णां प्रोक्तवर्षमुच्चगृहे । पैण्डादौ व्यन्तरगे प्राज्ञै स्त्रैराशिकं चिन्त्यम् ॥२३॥ पैण्डारुयमायुर्ब्रू ॓वते प्रधानं मणित्थचाणक्यमयादयश्च । एतन्न साध्वित्यवदद्भदन्तो • वराहसूर्यस्य तथैव वाक्यम् ॥२४॥ मणित्थ, चाणक्य, मय तथा अन्य आचार्यों ने "पिंडायु" को आयुर्दाय निश्चित करने का सर्वोत्तम प्रकार बताया है । परन्तु सत्या- चार्य के मत से यह प्रकार साधु (उत्तम) नहीं है । वराहमिहिर के मत से भी यह उत्तम प्रकार नहीं है ॥२४॥ सूर्यादिकानां स्वमतेन जीव- शर्मा स्वरांशं परमायुषोऽत्र । अस्यापि सर्वं हरणं विधेयं पूर्वोक्तवल्लग्नदशामपीह ॥२५॥ जीवशर्मा का मत है कि १२० वर्ष ५ दिन को ७ से भाग दीजियेः