भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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५३२ फलदीपिका १७ वर्ष ७३ दिन आये। प्रत्येक ग्रह १७ वर्ष ५ दिन प्रदान करता है। इस प्रत्येक ग्रह प्रदत्त १७ वर्ष २ मास १३ दिन में भी उन सब 'हरण' (ह्रास-घटाना, आदि) करना चाहिये जो पहिले बता चुके हैं। जैसे पहिले बता चुके हैं—वैसे लग्न प्रदत्त आयु भी जोड़नी चाहिये ॥२५॥ नृणां द्वादशवत्सरा दशहता ह्यायुःप्रमाणं परै- राख्यातं परमं शनेस्त्रिभगणं यावत्परैरीरितम् । कैश्चिच्चन्द्रसहस्रदर्शनमिह प्रोक्तं कलौ किन्तु यत् वेदोक्तं शरदः शतं हि परमायुर्दायमाचक्ष्महे ॥२६॥ कुछ लोगों ने मनुष्य की पूर्ण आयु १२० वर्ष कही है । कुछ अन्य की राय है कि शनि को ३ भ्रमण करने में जितना समय लगे उतनी मनुष्य की परमायु होती है । तीसरा मत यह है कि चन्द्रमा को १००० (एक हज़ार) परिभ्रमण में जितना समय लगता है— उतनी परमायु होती है । लेकिन हमारा विचार है कि कलियुग में वेदोक्त १०० वर्ष पूर्ण आयु होती है । श्रुति का वाक्य है “शतायुर्वै पुरुषः” । लग्नादित्येन्दुकानामधिकबलवतः स्याद्दशादौ ततोऽन्या तत्केन्द्रादिस्थितानामिह बहुषु पुनर्वीर्यतो वीर्यसाम्ये । बह्वायुर्वर्षदातुः प्रथममिनवशाच्चोदितस्याब्दसाम्ये वीर्यं किन्त्वत्र सन्धिग्रहविवरहतं भावसन्ध्यन्तराप्तम् ॥२७॥ लग्न, सूर्य और चन्द्र—इनमें जो बली होगा । उसकी दशा प्रथम आवेगी । तब उन ग्रहों की दशा आवेगी जो इस 'बली' (सूर्य, चन्द्र या लग्न) से केन्द्र में हों । तब उनकी जो इस बली से