फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाईसवां अध्याय : मिश्रदशा ५३३ 'पणफर' में हो, तब उनकी जो आपोक्लिम में हों। मान लीजिये १ से अधिक ग्रह केन्द्र में, है किस की दशा सर्वप्रथम आवेगी ? उसकी जो बली ग्रह से केन्द्र स्थित ग्रहों में सबसे बलवान् हो । यदि समान बली हों तो जो अधिक आयुकाल (वर्ष आदि) प्रदान कर रहा हो । यदि प्रदत्त आयुकाल भी बराबर हो तो उस ग्रह की दशा सर्वप्रथम आवेगी जो सूर्य से अस्त होकर सर्व प्रथम उदित होगा । यह क्रम प्रायः निम्नलिखित है (i) लग्न, सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि । यहाँ ग्रह का बल निम्न लिखित प्रकार से निकाला जाता है—भावमध्य से जितने अंश कला विकला पर ग्रह हो—उस अंतर को—भाव मध्य से भाव संधि के अंतर से भाग दीजिये । अंशोद्भवं लग्नबलात्प्रसाध्य- मायुश्च पिण्डोद्भवमर्कवीर्यात् । नैसर्गिकं चन्द्रबलात्प्रसाध्यं ब्रूमस्त्रयाणामपि वीर्यसाम्ये ॥२८॥ यदि लग्न बली हो तो अंशायुदाय लगाइये, सूर्य बली हो तो पिंडायु, चन्द्रमा बली हो निसर्गायु । यदि तीनों बली हों तो ? आगे के श्लोक बताते हैं । ॥२८॥ तेषां त्रयाणामिह संयुतिस्तु त्रिभिर्हृता सैव दशा प्रकल्प्या । वीर्ये द्वयोरेक्यदलं तयोः स्यात् चेज्जीवशर्मायुरमी बलोनाः ॥२९॥ यदि तीनों बली हों तो तीनों से जो आयु आती है—उनको जोड़