भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 535, कुल 684 में से

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५३४ फलदीपिका कर ३ से भाग दीजिये । यदि दो बली हों तो जो आयु आवे उनको जोड़कर २ का भाग दीजिये । यदि तीनों निर्बल हों तो जीव शर्मा ने जो प्रकार बताया है, उस प्रकार से आयु निकालिये । ॥२९॥ कालचक्रदशा ज्ञेया चन्द्रांशेशे बलान्विते । सदा नक्षत्रमार्गेण दशा बलवती स्मृता ॥३०॥ चन्द्रमा जिस नवांश में हो उसका स्वामी बलवान् हो तो काल चक्र दशा से विचार करना चाहिये । नक्षत्र दशा (विंशोत्तरी दशा) सदा बलवती होती है । ॥३० ॥ समाः षष्ठिर्द्विघ्ना मनुजकरिणां पञ्च च निशा हयानां द्वात्रिंशत्खरकरभयोः पञ्चककृतिः । विरूपा साप्य्यायुर्वृ षमहिषयोर्द्वादश शुनां स्मृतं छागादीनां दशकसहिताः षट् च परमम् ॥३१॥ मनुष्य (स्त्री या पुरुष) तथा हाथी की परमायु १२० वर्ष की, घोड़ों की ३२ वर्ष, ऊँट और गधों की परमायु २५ वर्ष की, बैल और भैंस की आयु २४ वर्ष, कुत्ते की १२ वर्ष तथा भेड़ वगैरह की १६ वर्ष । ॥ ३१ ॥ ये धर्मकर्मनिरता विजितेन्द्रिया ये ये पथ्यभोजनजुषो द्विजदेवभक्ताः । लोके नरा दधति ये कुलशीललीलां तेषामिदं कथितमायुरुदारधीभिः ॥३२॥

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