फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतेईसवां अध्याय : अष्टकवर्ग ५३७ गोचर विचार को अष्टक वर्ग विचार कहते हैं। अष्टक का अर्थ है आठ । यह आठ कौन-कौन हैं—सात ग्रह और जन्म लग्न । आठों से विचार करने पर कोई भी ग्रह अधिक के दृष्टिकोण से शुभ हो तो शुभ और अशुभ हो तो अशुभ । यह अष्टक वर्ग विचार कहलाता है। गोचरग्रहवशान्मनुजानां यच्छुभाशुभफलाभ्युपलब्धये । अष्टवर्ग इति यो महदुक्तस्तत्प्रसाधनमिहाभिदधेऽहम् ॥१॥ ग्रहों के गोचरवश (विभिन्न राशियों में भ्रमणवश) क्या शुभ या अशुभ फल होता है। यह जानने के लिये अष्टक वर्ग की बहुत प्रशंसा की गई है । इसलिये अब मैं अष्टक वर्ग बनाना बताता हूँ ॥१॥ आलिख्य सम्यग्भुवि राशिचक्रं ग्रहस्थितिं तज्जननप्रवृत्ताम् । तत्तद्ग्रहक्षात्क्रमशोऽष्टवर्गं प्रोक्तं करोत्यक्षविधानमत्र ॥२॥ पहले भूमि पर राशि चक्र आदि बनाने की प्रथा थी और जहाँ पर बिन्दी लगानी होती वहाँ रुद्राक्ष का दाना या अन्य कोई गोली के आकार का फल रखकर गणना किया करते थे किन्तु अब हम लोग सब कार्य कागज़ पर करते हैं और जहाँ पर गोली का निशान बनाना हो वहाँ ० (शून्य) का चिह्न लगा देते हैं। इसलिये श्लोकों में यद्यपि अक्ष (गोली) रखना आदि लिखा है तथापि हम अपनी व्याख्या में इस दक्षिण भारत में शुभ स्थानों पर बिन्दु रक्खे जाते हैं अशुभ स्थानों पर रेखा । उत्तर भारत में शुभ स्थानों पर रेखा रखी जाती है अशुभ स्थानों पर बिन्दु । बात एक ही है । तात्पर्य शुभ या अशुभ से है—चाहे उसे रेखा कहिये या बिन्दु ।