भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 548, कुल 684 में से

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तेईसवाँ अध्याय : अष्टकवर्ग ५४७ उतना ही अधिक अशुभ समझना चाहिये । यह साधारण नियम है । इसके अतिरिक्त दो बातें और ध्यान में रखनी चाहियें :— (अ) यदि ग्रह गोचर वश अपनी स्वयं की राशि, अपनी उच्च राशि या अपने मित्र की राशि में जा रहा हो या उपचय* स्थान में जा रहा हो तो ख़राब फल में कमी करता है और अच्छे फल को और भी बढ़ाता है । इसका अर्थ यह हुआ कि मान लीजिये तीन बिन्दु है किन्तु स्वराशि और उपचय स्थान में जा रहा है तो उतना खराब नहीं होगा । यदि ५ बिन्दु हों और उपचय स्थान में हो—मित्र राशि में हो तो जितना शुभ फल ५ बिन्दु के कारण करना चाहिये उससे भी अधिक करेगा । (ब) यदि ग्रह नीच राशि, शत्रु राशि या अनुपचय** स्थान में गोचर वश जा रहा हो तो यदि थोड़े बिन्दु होने के कारण अशुभ फल देने वाला है तो और भी अशुभ फल करेगा । यदि अनुपचय राशि में हो—नीच राशि में हो तों अधिक बिन्दु होने के कारण जैसा शुभ फल करना चाहिए वैसा न करके उससे कम शुभ फल करेगा । यहाँ एक शंका उठती है । मित्र राशि में तो है लेकिन अनुपचय राशि में हो या शत्रु राशि में हो किन्तु उपचय राशि में, तो क्या फल ? इसका उत्तर यही है : शुभ अशुभ (क) अधिक बिन्दु होना (घ) थोड़े बिन्दु होना

  • लग्न से तीसरा, छठा, दसवाँ, ग्यारहवाँ—यह चार जगह उपचय कहलाती हैं । ** लग्न से १, २, ४, ५, ७, ८, ९, १२ अनुपचय स्थान कहलाते हैं ।
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