भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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तेईसवां अध्याय : अष्टकवर्ग ५४९

समझना चाहिए बल्कि मृत्यु समान कष्ट आदि—व्याधि, द्रव्य हानि आदि समझना । यदि एक शुभ बिन्दु हो तो नाश या हानि होती है; यदि दो बिन्दु हों तो व्यय, तीन बिन्दु हों तो भय, चार बिन्दु हों तो भी भय। यद्यपि मन्त्रेश्वर महाराज ने तीन बिन्दु और चार बिन्दु दोनों का प्रायः एक ही फल दिया है किन्तु हमारे विचार से चार बिन्दु वाली राशि में गोचर वश अनिष्ट फल नहीं होगा। यदि पाँच बिन्दु हों तो वाञ्छित वस्तु की प्राप्ति या धन, ६ बिन्दु हों तो स्त्री प्राप्ति, ७ बिन्दु हों तो लक्ष्मी प्राप्ति और ८ बिन्दु हों तो राज्य सिद्धि होती है अर्थात् राज दरबार में मान सम्मान बढ़े ॥११॥

तत्तद्ग्रहाधिष्ठितसर्वराशीं- स्तत्संज्ञितं लग्नमिति प्रकल्प्य । तेभ्यः फलान्यष्टविधान्यभूवं- स्तत्तद्गृहाद्वा ववशाद्वदन्तु ॥१२॥

भारतवर्ष में दो प्रकार के अष्टक वर्ग चक्र बनाए जाते हैं—एक तो जैसे हमने सूर्य का अ