भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 551, कुल 684 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 551

५५० फलदीपिका। रखना। अब इस लग्न से आप सूर्य का अष्टक वर्ग देखिये कि किस भाव में कितने शुभ बिन्दु हैं। इस लग्न से जिस भाव में अधिक बिन्दु हैं उस भाव सम्बन्धी फल—जब सूर्य उस राशि में गोचर वश आवेगा, उत्तम करेगा। उदाहरण के लिये सूर्य जन्म कुण्डली में वृश्चिक में है इससे सप्तम वृषभ राशि है और वृषभ में ७ बिन्दु हैं इस कारण जब सूर्य वृषभ राशि में जावेगा तो स्त्री सम्बन्धी या सप्तम भाव सम्बन्धी उत्तम फल करेगा। ऊपर वृश्चिक से पाँचवें मीन में केवल एक बिन्दु है, इस कारण जब मीन में सूर्य आवेगा तब मानसिक चिन्ता, उद्वेग, सन्तान कष्ट, उदर विकार आदि करेगा। जिस ग्रह का गोचर विचार करना हो, वह ग्रह जिस राशि में जन्म कुण्डली में हो उस राशि को लग्न मानकर फलादेश कीजिये, यह इस श्लोक का सार है ॥१२॥ तत्तद्ग्रहाक्षांशकतुल्यभांश स्थिता ग्रहाश्चारवशादिदानीम् । तथैव तद्भावसमुत्थितानि फलानि कुर्वन्ति शुभाशुभानि ॥१३॥ अब यह बताते हैं कि गोचर वश शुभाशुभ फल कब होगा। जिस राशि में थोड़े बिन्दु हैं वहाँ अशुभ फल और जिस राशि में अधिक बिन्दु हैं वहाँ शुभ फल। परन्तु बृहस्पति एक राशि में साल भर रहता है और शनि २½ वर्ष; तब यह कैसे निश्चय किया जाय कि इस साल भर में या २½ साल के लम्बे अर्से में गोचर वश ग्रह अपना इष्ट या अनिष्ट प्रभाव