भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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५५२ फलदीपिका बृहस्पति, यज्ञदत्त, देवदत्त, भवदत्त तीनों के अनुकूल है, तब तीनों को क्या एक ही फल प्राप्त होगा ? नहीं। यदि यज्ञदत्त की जन्म कुण्डली में मेष का बृहस्पति है तो मेष से धनु नवम होने से उसे नवम भाव सम्बन्धी हर्ष होगा—भाग्योदय होगा। यदि देवदत्त की जन्म कुण्डली में मिथुन का बृहस्पति है तो मिथुन से धनु सप्तम होने के कारण स्त्री सम्बन्धी हर्ष होगा और भवदत्त की कुण्डली में सिंह का बृहस्पति है तो सिंह से धनु पंचम होने के कारण पुत्र या विद्या सम्बन्धी हर्ष होगा ॥१४॥ एकत्र भावे बहवो यदानी- मुक्ताङ्गाश्चारवशाद्व्रजन्ति । पुष्णन्ति तद्भावफलानि सम्यक् तत्कारकात्तत्तनुपूर्वभावे ॥१५॥ ऊपर यह सिद्धांत बता चुके हैं कि किस भाव सम्बन्धी फल होगा। इसका विचार करने के लिये यह देखना चाहिये कि जिस ग्रह का गोचरवश विचार किया जा रहा है, वह जन्मकुण्डली में किस राशि में है। मान लीजिये कि बृहस्पति अपनी जन्माधिष्ठित* राशि से दशम में जा रहा है और बृहस्पति के अष्टक वर्ग में वहाँ अधिक बिन्दु हैं; शनि अपनी जन्माधिष्ठित राशि से दशम में जा रहा है और शनि के अष्टक वर्ग में वहाँ (जहाँ कुण्डली में शनि है वहाँ से दशम स्थान पर) अधिक बिन्दु हैं; सूर्य अपनी जन्माधिष्ठित राशि से दशम में जा रहा हैं और सूर्य के अष्टक वर्ग में वहाँ उसके अधिक बिन्दु हैं। इस प्रकार जब अपनी-अपनी जन्म स्थानीय राशि से अनेक ग्रह एक साथ

  • जन्माधिष्ठित राशि का अर्थ है जन्म कुण्डली में जिस राशि में ग्रह हो ।