फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 554, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेईसवाँ अध्याय : अष्टकवर्ग ५५३ ही जिस भाव में जा रहे हों और उन राशियों में उनके स्वयं के अष्टक वर्ग में अधिक बिन्दु हों तो उस भाव सम्बन्धी विशेष शुभ फल होता है। जैसे ऊपर सूर्य, बृहस्पति, शनि अपनी-अपनी जन्माधिष्ठित राशि से गोचरवश दशम में हों और वहाँ उनके स्वयं के अष्टक वर्ग में अधिक बिन्दु हों तो दशम भाव सम्बन्धी शुभ फल होगा ॥१५॥ बिन्दौ स्थिते तत्फलसिद्धिकाल विनिर्णयाय प्रहितेऽष्टवर्गे । भान्यष्टधा तत्र विभज्य कक्षा क्रमेण तेषां फलमाहुरन्ये ॥१६॥ आलिख्य चक्रं नव पूर्वरेखाः याम्योत्तरस्था दश च त्रिरेखाः । प्रस्तारकं षण्णवतिप्रकोष्ठं पङ्क्त्यष्टकं चाष्टकवर्गजं स्यात् ॥१७॥ होराशशीबोधनशुक्रसूर्य- भौमामरेन्द्रार्चितभानुपुत्राः । याम्यादिपङ्क्त्यष्टकराशिनाथाः क्रमेण तद्विन्दुफलप्रदाः स्युः ॥१८॥ राश्यष्टभागप्रथमांशकाले शनिर्द्वितीये तु गुरुः फलाय । कक्षाक्रमेणैवमिहान्त्यभाग- काले विलग्नं फलदं प्रदिष्टम् ॥१९॥ श्लोक १६ में यह बताया गया है कि गोचर फल कब होता है। आगे के पृष्ठ पर शनिका प्रस्ताराष्टक वर्ग दिया जा रहा है