भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 556, कुल 684 में से

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पृष्ठ 556

तेईसवां अध्याय : अष्टकवर्ग ५५५

शनि २॥ वर्ष एक राशि में रहता है, किस समय उसका शुभ या अशुभ फल होगा ? निर्णय का एक प्रकार तो १३ वें श्लोक में बता दिया अब दूसरा प्रकार बताते हैं । पृष्ठ ५४४ पर लिखे अनुसार ९६ वर्ग का एक चक्र बनाइये और मान लीजिए आपको शनि का गोचर विचार करना है तो पृष्ठ ५४५ पर जो शनि का अष्टक वर्ग बनाने का प्रकार दिया गया है उसी प्रकार से शनि का अष्टक वर्ग बनाइए । लिखा है कि शनि का अटक वर्ग बनाने में सूर्य से १-२-४- ७-८-१०-११ स्थानों में शुभ बिन्दु डालना इसलिये सूर्य वृश्चिक राशि में है और वृश्चिक से १-२-४-७-८-१०-११ हुये—वृश्चिक, धनु, कुम्भ, वृषभ, मिथुन, सिंह और कन्या—इनमें शुभ बिन्दू लगाइये । इस प्रकार अन्य ग्रहों से भी जहाँ जहाँ शुभ विन्दु पड़ने चाहियें वहाँ वहाँ शुभ बिंदु लगाने से पिछले पृष्ठ पर दिया गया शनि का अष्टक वर्ग तैयार होगा । ऊपर मेष में शनि के दो बिन्दु आये हैं—वृष में ४, मिथुन में ३, कर्क में १, सिंह में ७, कन्या में ६, तुला में ४, वृश्चिक में ३, धनु में १, मकर में ३, कुम्भ में ३ और मीन में २। अब आप पृष्ठ ५४५ देखिये जहां शनि का अष्टक वर्ग बनाया है । सिंह लग्न में ७ बिन्दु हैं लग्न से दूसरे कन्या में ६ बिन्दु हैं लग्न से तीसरे तुला में ४ बिन्दु हैं इत्यादि। पृष्ठ ५४५ पर और पृष्ठ ५५४ पर दोनों एक ही कुण्डली के शनि के अष्टक वर्ग हैं तब पृष्ठ ५५४ फिर वही अष्टक वर्ग पुनः क्यों बनाया गया ? इसलिये कि पृष्ठ ५५४ पर जो अष्टक वर्ग बनाया गया है उसमें यह मालूम होता है कि किस-किस ग्रह ने किस-किस राशि में शुभ बिन्दु डाले हैं। इसका प्रयोजन क्या ? यही बताते हैं । प्रत्येक राशि के आठ भाग कीजिये । यह मालूम ही है कि एक राशि में ३० अंश होते हैं इस कारण ३० को ८ से भाग देने पर ३ अंश ४५ कला आए । तीन-तीन अंश और पेंतालीस-पेंतालीस कलाओं के आठ भाग हो गए । चाहे कोई भी राशि हो प्रथम आठवें