भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 557

५५६ फलदीपिका भाग पर शनि का अधिकार माना है। इसलिये प्रारम्भिक ३ अंश ४५ कला तक शनि की कक्षा कहलाती है। दूसरे अष्टमांश पर बृहस्पति का अधिकार माना है। इस कारण ३°-४५' से ७½ अंश तक बृहस्पति की कक्षा हुई। बृहस्पति के बाद तृतीय अष्टमांश अर्थात् ७°-३०' से ११°-१५' तक मंगल की कक्षा हुई। मंगल के बाद सूर्य की कक्षा, सूर्य के बाद शुक्र की कक्षा, उसके बाद बुध की और बुध के बाद चन्द्रमा की कक्षा होती है। अन्तिम कक्षा २६°-१५' से ३०° तक लग्न की कक्षा होती है। इसी कारण पृष्ठ ५५४ पर जो शनि का अष्टक वर्ग चक्र दिया है उनमें श० बृ०, मं० सू० शु०, बु० च० ल० यह क्रम रखा है। अब देखिये सिंह राशि में शनि, बृहस्पति, मंगल, सूर्य, बुध, चन्द्र, लग्न, इनसे शुभ बिन्दु पड़े हैं इस कारण जब इन कक्षाओं में शनि जावेगा तब गोचर वश शुभ प्रभाव दिखावेगा किन्तु जब शुक्र की कक्षा में जावेगा (शुक्र की पांचवी कक्षा होती है १५° से १८°-४५' तक) तब शुभ फल नहीं दिखावेगा बल्कि अशुभ फल दिखावेगा क्योंकि शनि के अष्टक वर्ग में शुक्र से सिंह राशि में कोई शुभ बिन्दु नहीं पड़ा। यह सूक्ष्म गोचर विचार है ॥ १६-१९ ॥ सर्वग्रहाणां प्रहितेऽष्टवर्गे तत्कालराशिस्थितबिन्दुयोगे । अष्टाक्षसंख्याधिकविन्दवश्चेत् शुभं तदूने व्यसनं क्रमेण ॥२०॥ अब सर्वाष्टक वर्ग बनाना बताते हैं। निम्नलिखित प्रकार से सर्वाष्टक वर्ग बनाइये। पहले जितने शुभ बिन्दु हैं—उनको किस अष्टक वर्ग में, किस राशि में, कितने शुभ बिन्दु हैं यह लिख लीजिये फिर एक नया अष्टक वर्ग चक्र बनाकर भिन्न-भिन्न अष्टक वर्गों में जितने शुभ बिन्दु हैं उनको प्रत्येक राशि के विचार से जोड़ लीजिए।