भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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५६६ फलदीपिका राशि में जिस कन्या का जन्म है (कन्या की चन्द्र राशि हो या जन्म लग्न हो) उससे विवाह होने से वंश की वृद्धि होगी। यदि जातक की कुंडली में शुक्र के अष्टक वर्ग में जिस राशि में थोड़े शुभ बिन्दु हों— उस जन्म लग्न या चन्द्र राशि वाली कन्या से विवाह हो तो सन्तान थोड़ी होगी। टीकाकारों ने इस श्लोक का अर्थ निम्न प्रकार से भी किया है— जिस राशि में—जातक के शुक्र के अष्टक वर्ग में अधिक शुभ बिन्दु हों—उस राशि की दशा में जिस कन्या का जन्म हुआ हो, उस कन्या से विवाह विशेष सन्तानप्रद होती है और जातक के शुक्राष्टक वर्ग में जिस राशि में कम शुभ बिन्दु हों—उस दिशा में जन्म लेने वाली कन्या से विवाह करने से कम सन्तान होती है ॥१२॥ शोध्यपिण्डं शनेर्लग्नाद्धत्वा रन्ध्रफलैः सुखैः । हृत्वावशेषभं याते मन्दे जीवेऽपि वा मृतिः ॥१३॥ शनि के अष्टक वर्ग में जो शोध्यपिंड की संख्या हो—उसे शनि के अष्टक वर्ग में लग्न से अष्टम राशि में जितने शुभ बिन्दु हों उनसे गुणा कीजिये। २७ का भाग दीजिये। जो शेष आवे उस संख्या के नक्षत्र में जब गोचर से बृहस्पति या शनि जावे तो जातक की मृत्यु हो सकती है। (जब मारक ग्रह की दशा, अन्तर्दशा हो तभी यह फल होता है) ॥१३॥ लग्नादिमन्दान्तफलक्यसंख्या- वर्षे विपत्तिस्तु तथार्कपुत्रात् । यावद्विलग्नान्तफलानि तस्मिन्- नाशो हि तद्योगसमानवर्षे ॥१४॥