भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

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चौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५६५ भौमात्तृतीयाराशिस्थफलैर्भ्रातृगणं वदेत् । बुधात्सुखफलैर्बन्धुगणं वा मातुलस्य च ॥६॥ मंगल के अष्टक वर्ग में—मंगल जिस राशि में है उससे तृतीय राशि में मंगल के अष्टकवर्ग में कितने शुभ बिन्दु हैं यह देखिये । उतने ही भाई उस जातक के होंगे। बुध के अष्टक वर्ग में बुध जिस राशि में है उससे चौथी राशि में कितने शुभ बिन्दु हैं ? जितने शुभ बिन्दु हों उतने ही मामा या बन्धु होंगे ॥९॥ गुरुस्थितसुतस्थाने यावतां विद्यते फलम् । शत्रु नीचग्रहं त्यक्त्वा शेषास्तस्यात्मजाः स्मृताः ॥१०॥ बृहस्पति के अष्टकवर्ग में बृहस्पति जिस राशि में है—उससे पंचम राशि में जितने शुभ बिन्दु होंगें उतने ही पुत्र होंगे । किन्तु यदि किसी शत्रु या नीच ग्रह ने इस राशि में बिन्दु प्रदान किया हो—ऐसे शत्रु, नीच ग्रह के बिन्दु कम कर दीजिये ॥१०॥ गुरोरष्टकवर्गे तु शोध्यशिष्टफलानि वै । क्रूरराशिफलं त्यक्त्वा शेषास्तस्यात्मजाः स्मृताः ॥११॥ बृहस्पति के अष्टकवर्ग में त्रिकोण शोधन और एकाधिपत्य शोधन के बाद जो संख्या आवे—उसमें से क्रूर राशियों में जो बिन्दु हों उन्हें कम कर दीजिये । शेष जितने बचें उतने ही पुत्र होंगे ॥११॥ फलाधिकं भृगोर्यत्र तत्र भार्याजनिर्यदि । तस्यां वंशाभिवृद्धिः स्यादल्पे क्षीणार्थसंततिः ॥१२॥ शुक्र के अष्टक वर्ग में जिन राशियों में अधिक शुभ बिन्दु हैं उस