फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
पृष्ठ 573, कुल 684 में से
संदर्भ में पढ़ें५७२ फलदीपिका है । इसलिये सूर्याष्टक वर्ग के त्रिकोण शोधन के उपरान्त कर्क में १, वृश्चिक में १ तथा मीन में १ रखिये । यह द्वितीय मत "होरा-रत्न" के लेखक बलभद्रजी का है । पराशर का मत उत्तर भारत में विशेष प्रचलित है । बलभद्रजी का दक्षिण भारत में : मूल ग्रंथ का संस्कृत श्लोकांश निम्नलिखित है :— त्रिकोणेषु तु यन्न्यूनं तत्तुल्यं त्रिषु शोधयेत् अर्थात् त्रिकोणों में जो कम है उसके बराबर तीनों में शोधन करे । एक मत कहता है कि इसका अर्थ हुआ उस न्यून संख्या को तीनों में से कम करे । दूसरा मत कहता है—उस न्यून संख्या के बराबर—तीनों में रखें । मन्त्रेश्वर का मत : मंत्रेश्वर महाराज ने अपनी फलदीपिका में संस्कृत के वही शब्द दिये हैं जो पराशर जी या बलभद्र जी के ग्रंथों में मिलते हैं अर्थात् श्लोक १६ और १७ । अर्थात् (१) सूर्य या किसी अन्य ग्रह के अष्टक वर्ग में त्रिकोण शोधन करना हो तो—त्रिकोण की तीनों राशियों में से जिसमें सबसे कम संख्या हो उसके समान तीनों में शोधन करे । प्रश्न उठता है कि उसके समान संख्या तीनों में घटा कर शोधन करे—अर्थात् घटाकर शेष स्थापित करे या उसके समान संख्या शोधन करे अर्थात् उसके समान संख्या स्थापित करे । उपर्युक्त श्लोकों के दो अर्थ हो सकते हैं। पराशर जी के टीका- कार जो अर्थ करते चले आये हैं—वह प्रथम मत के नाम से ऊपर समझाया गया है। बलभद्र जी इसी श्लोक की जो व्याख्या होरारत्न में करते हैं—और जो दक्षिण भारत में प्रचलित है वह द्वितीय मत के नाम से ऊपर कह चुके हैं ।