भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 574

चौबीसवां अध्याय : अष्टकवर्गफल ५७३ (२) यदि त्रिकोण की दो राशियों में शून्य हो तो तीसरी राशि का शोधन करें। अर्थात् तीसरी राशि में भी शून्य स्थापित करे। (इस मत से बलभद्रजी के मत की पुष्टि होती है। क्योंकि पराशरजी के टीकाकारों के अनुसार तो—न्यून को अधिक में से घटाकर—शेष को अधिक के स्थान में रखना। शून्य को अधिक में से घटाया तो जैसी संख्या थी वैसी ही रहनी चाहिये। परन्तु फलदीपिकाकार लिखते हैं कि उसे शोधन करे तो इसका अर्थ यही हुआ कि वहाँ भी ० स्थापित करे। (३) यदि तीनों राशियों में समान संख्या हो तो तीनों को शोधन करे। अर्थात् तीनों राशियों में ० रखें। *जातक पारिजात का भी मत है कि (१) त्रिकोण की तीनों राशियों में—जिसमें सबसे कम वाली संख्या हो—वही सबसे कम वाली संख्या अन्य दोनों राशियों में स्थापित कर, (२) यदि तीनों राशियों में से एक में शून्य हो तो बाकी दोनों का शोधन न करे,(३) यदि तीनों में समान संख्या हो तो सबके स्थान में ० रख दे। प्रश्न मार्ग का मत है कि भूचक्रे निहतेऽष्टवर्गजफले भेषु त्रिकोणेषु यन्न्यूनं तेन समं त्यजेत्त्रिषु च यद्येकत्र न स्यात् फलम् । जह्यात् सर्वमथान्ययोर्यदि फलान्येकत्र चेत्केवलं जह्यात्तानि यदा समं त्रिषु तदा सर्वं विशोध्यं ततः ॥ इस मत के अनुसार यदि त्रिकोण की एक अथवा दो राशियों में कोई संख्या न हो तो—तो त्रिकोण की तीनों राशियों में ० स्थापित करे। यदि तीनों में समान संख्या हो तो भी तीनों राशियों में ० रखे। *देखिये जातक पारिजात अध्याय १० श्लोक ३८।