भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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५८० फलदीपिका का विषय तो गणित का विषय है। एक सिद्धान्त पर आना पड़ेगा कि इस कोष्ठ में २ रखा जावे या ३, या ४ इत्यादि । जो विद्वान् पाठक तुलनात्मक अध्ययन करना चाहें वे विविध मूल ग्रंथों के वाक्यों का समन्वय या तारतम्य कर सकते हैं—पर इस हिन्दी पुस्तक का उद्देश्य तो नवीन पाठकों को निश्चयात्मक रूप से एक पद्धति या क्रम बताने का है—जिससे वे इसमें बताये गये नियम लागू कर किसी जन्म कुण्डली का त्रिकोण शोधन, एकाधिपत्य शोधन कर सकें। अब उदाहरण कुण्डली का एकाधिपत्य शोधन नीचे दिया जाता है :— त्रिकोणशोधनां कृत्वा पश्चादैकाधिपत्यकम् । क्षेत्रद्वये फलानि स्युस्तदा संशोध्येत्सुधीः ॥१८॥ ग्रहयुक्ते फलैर्हीने ग्रहाभावे फलाधिके । ऊनेन सहशन्त्वस्मिन् शोधयेद्ग्रहवर्जिते ॥१९॥ फलाधिके ग्रहैर्युक्ते चान्यस्मिन् सर्वमुत्सृजेत् । सग्रहाग्रहतुल्यत्वे सर्वं संशोध्यमग्रहात् ॥२०॥ उभाभ्यां ग्रहहीनाभ्यां समत्वे सकलं त्यजेत् । उभयोर्ग्रहसंयुक्ते न संशोध्यं कदाचन ॥२१॥ एकस्मिन् भवने शून्ये न संशोध्यं कदाचन । द्वावग्रहौ चेद्यन्न्यूनं तत्तुल्यं शोधयेद्द्वयोः ॥२२॥ शोध्यावशिष्टं संस्थाप्य राशिमानेन वर्द्धयेत् । ग्रहयुक्तेऽपि तद्राशौ ग्रहमानेन वर्द्धयेत् ॥२३॥