फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५९८ फलदीपिका ऊपर जो यह नियम बताया गया है कि जिस राशि भाव में अधिक बिन्दु होने से अच्छा फल होता है यह नियम छठे, आठवें, बारहवें घर के लिये लागू नहीं होता । जो राशियाँ श्रेष्ठ हों-अर्थात् अधिक बिन्दु वाली हों उन लग्नों में और उन राशियों में जब सूर्यादि ग्रह आवें तब शुभ कार्य करे । इसमें सफलता मिलती है और उत्कर्ष मिलता है ॥४०॥ लग्नात्प्रभृति मन्दान्तमेकीकृत्य फलानि वै । सप्तभिर्गुणयेत्पश्चात्सप्तविंशहतात्फलम् ॥४१॥ तत्समानगते वर्षे दुःखं वा रोगमाप्नुयात् । एवं मन्दादि लग्नान्तं भौमराह्वोस्तथा फलम् ॥४२॥ लग्न से शनि जिस राशि है उस तक, (लग्न और शनि वाली राशियों को शामिल करते हुए) सर्वाष्टक वर्ग में प्रति राशि में जितने बिन्दु हैं जोड़िये । इसे ७ से गुणा कर २७ से भाग दीजिये । जो भजन- फल आवे—उसकी जो संख्या हो—उस वर्ष में कष्ट हो—दुःख या रोग हो । इसी प्रकार शनि जिस राशि में हो उससे लग्न तक (शनि वाली राशि और लग्न दोनों शामिल कीजिये)—इन राशियों में जितने शुभ बिन्दु हों उन्हें ७ से गुणा कर २७ से भाग दीजिये । जो भजनफल आवे—उसकी जो संख्या हो—आयु के उस वर्ष में कष्ट, दुःख या रोग होता है । इसी प्रकार (१) लग्न से मंगल वाली राशि तक (२) मंगल से लग्न तक (३) लग्न से राहु वाली राशि तक—जैसे शनि के कारण गणना ऊपर बताई गई है— (४) राहु से लग्न तक उसी पद्धति से सब संख्या जोड़ कर ७ से गुणा कर २७ से भाग देने से अनिष्ट वर्ष निकल आते हैं ।