भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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चौबीसवाँ अध्याय : अष्टकवर्गफल ५९९ शुभग्रहाणां संयोगसमानाब्दे शुभं भवेत् । पुत्रवित्तसुखादीनि लभते नात्र संशयः ॥४३॥ जैसे, शनि, मंगल राहु इन पापग्रहों की राशि तक या इन पाप- ग्रहों वाली राशि से लग्न तक सर्वाष्टक बिन्दु योग से कष्ट वर्ष का ज्ञान हो जाता है वैसे ही (१) लग्न से शुभ ग्रह जहाँ स्थित हो (२) शुभ ग्रह जहाँ स्थित हों वहाँ से लग्न तक—सब राशियों के बिन्दु जोड़कर ७ का गुणा कर २७ से भाग देने से शुभ वर्ष निकालना चाहिये । बलवान् चन्द्रमा जिसमें पक्षबल अधिक हो और पापग्रह के साथ न बैठा हो, बुध (पाप ग्रह के साथ न हो, शुक्र और बृहस्पति शुभ ग्रह हैं। इन शुभ वर्षों में पुत्र जन्म, धनागम आदि शुभ फल होते हैं ॥४३॥ संग्रहेण मया प्रोक्तमष्टवर्गफलं त्विह । तज्ज्ञैर् विस्तरतः प्रोक्तमन्यत्र पटुबुद्धिभिः ॥४४॥ यह मैने संक्षेप से अष्टक वर्ग का फलांदेश किया है। और ग्रंथों मे विद्वानों ने उनका विस्तार से वर्णन किया है ॥४४॥