फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
चौबीसवाँ अध्याय : अष्टकवर्गफल ५९९ शुभग्रहाणां संयोगसमानाब्दे शुभं भवेत् । पुत्रवित्तसुखादीनि लभते नात्र संशयः ॥४३॥ जैसे, शनि, मंगल राहु इन पापग्रहों की राशि तक या इन पाप- ग्रहों वाली राशि से लग्न तक सर्वाष्टक बिन्दु योग से कष्ट वर्ष का ज्ञान हो जाता है वैसे ही (१) लग्न से शुभ ग्रह जहाँ स्थित हो (२) शुभ ग्रह जहाँ स्थित हों वहाँ से लग्न तक—सब राशियों के बिन्दु जोड़कर ७ का गुणा कर २७ से भाग देने से शुभ वर्ष निकालना चाहिये । बलवान् चन्द्रमा जिसमें पक्षबल अधिक हो और पापग्रह के साथ न बैठा हो, बुध (पाप ग्रह के साथ न हो, शुक्र और बृहस्पति शुभ ग्रह हैं। इन शुभ वर्षों में पुत्र जन्म, धनागम आदि शुभ फल होते हैं ॥४३॥ संग्रहेण मया प्रोक्तमष्टवर्गफलं त्विह । तज्ज्ञैर् विस्तरतः प्रोक्तमन्यत्र पटुबुद्धिभिः ॥४४॥ यह मैने संक्षेप से अष्टक वर्ग का फलांदेश किया है। और ग्रंथों मे विद्वानों ने उनका विस्तार से वर्णन किया है ॥४४॥
पच्चीसवां अध्याय गुलिकादि उपग्रह गुलिक आदि निकालने का प्रकार और उनका फल-विचार नमामि मान्दिं यमकण्टकाख्य- मर्द्धप्रहारं भुवि कालसंज्ञम् । धूमव्यतीपातपरिध्यभिख्यान्- उपग्रहानिन्द्रधनुश्च केतून् ॥१॥ चरं रुद्रदास्यं घटं नित्यतानं खनिर्मान्दिनाड्यः क्रमेणार्कवारात् । अहर्मानवृद्धिक्षयौ तत्र कार्यों निशायां तु वारेश्वरात्पञ्चमाद्याः ॥२॥ दिव्या घटी नित्यतनुः खनीनां चन्दे रुहः स्याद्यमकण्टकस्य । अर्द्धप्रहारस्य भटो नटेन स्तनौ खनी चन्द्रखरौ जयज्ञः ॥३॥ कालस्य फेनं तनुरुद्रदिव्यं वन्द्यो नटस्तैरनुसूर्यवारात् । एषां समं मान्दिवदेव तत्त न्नाड्या स्फुट लग्नवदत्र साध्यम् ॥४॥ धूमो वेदगृहैस्त्रयोदशभिरप्यंशैः समेते रवौ स्यात्तस्मिन् व्यतिपातको विगलिते चक्राद्यथास्मिन्युते ।
पच्चीसवां अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६०१ षड्भिर्भैः परिवेष इन्द्रधनुरित्यस्मिंश्च्युते मण्डला- दत्यष्ट्यंशयुतेऽत्र केतुरथ तत्रैकर्क्षयुक्तो रविः ॥५॥ (१) मान्दि, (२) यमकंटक, (३) अर्द्धप्रहार, (४) काल, (५) धूम, (६) व्यतीपात, (७) परिधि, (८) इन्द्रधनु और (९) उपकेतु —इन नवों उप-ग्रहों को मैं नमस्कार करता हूँ । यदि दिनमान ३० घड़ी हो तो रविवार को सूर्योदय के २६ घड़ी बाद मान्दि होगा; सोमवार को २२ घड़ी बाद; मंगलवार को १८ घड़ी बाद, बुध को १४ घड़ी बाद, बृहस्पतिवार को सूर्योदय से १० घड़ी बाद; शुक्रवार को सूर्योदय से ६ घड़ी बाद और शनिवार को सूर्योदय के २ घड़ी बाद मान्दि होता है। यदि दिनमान पूरा तीस घड़ी न हो—कुछ कम या अधिक हो तो उसी अनुपात से २६, २२, १८, १४, १०, ६, २—यह जो घड़ियाँ बताई गई हैं इनमें अन्तर कर देना चाहिये। इस प्रकार दिन के समय मान्दि की स्थिति निकाली जा सकती है। रात्रि के समय मान्दि की स्थिति रात्रि-उदय काल (अर्थात् जब दिनमान समाप्त होता है) उसके बाद किस वार को कितने घड़ी पर होगा, यह नीचे बताया जाता है। रविवार को सूर्यास्त के बाद १० घड़ी पर सोमवार को ,, ,, ६ मंगलवार को ,, ,, २ बुधवार को ,, ,, २६ बृहस्पतिवार को ,, ,, २२ शुक्रवार को ,, ,, १८ शनिवार को ,, ,. १४ रात्रिमान यदि पूरा तीस घड़ी न हो कुछ कम या अधिक हो तो अनुपात से अन्तर करना चाहिये ।
६०२ फलदीपिका (iii) ऊपर जो संस्कृत के श्लोक में मान्दि निकालने का तरीका बताया गया है उसको हम दूसरे प्रकार से समझाते हैं। मान्दि और गुलिक एक ही बात है। दिनमान के आठ भाग कीजिये। सात भागों के स्वामी सातों वारों के स्वामी होते हैं। आठवें भाग का स्वामी कोई नहीं होता। शनि के भाग का जो काल है उसे मान्दि या गुलिक कहते हैं। 'मन्द' शनि का नाम है। मन्द कहते हैं धीरे को। शनैश्चर का अर्थ भी है धीरे चलने वाला। मन्द (शनि) का काल या शनि वाला आठवाँ भाग मान्दि (मन्द का बेटा) कहलाता है। मान लीजिये आपको रविवार को मान्दि निकालना है तो दिनमान के आठ भाग कीजिये। सातवाँ भाग जिस घड़ी-पल पर समाप्त होता है वह मान्दि स्पष्ट होगा। क्यों? प्रथम भाग रवि का, दूसरा मोम का, तीसरा मंगल का, इस क्रम से सातवाँ भाग शनि का आया। यदि आप को बुधवार को मान्दि निकालना है तो भी दिन- मान के आठ भाग कीजिये। पहला बुध का, दूसरा बृहस्पति का, तीसरा शुक्र का और चौथा शनि का हिस्सा होगा--मान लीजिये ३२ घड़ी दिनमान है तो ठीक १६ घड़ी के अन्त पर शनि का भाग समाप्त होगा और १६ घड़ी के इष्ट पर जो लग्न आवे उस लग्न-स्पष्ट के तुल्य मान्दि स्पष्ट होगा। दिन के समय तो जो वार होता है उसी से गणना प्रारम्भ करते हैं किंतु रात्रि के समय दूसरा क्रम है। रात्रिमान के आठ भाग कीजिये और यह देखिये कि शनि का भाग किस घड़ी पर समाप्त होता है। उसी समय मान्दि समाप्त हो जाती है। रात्रि के समय मान्दि निकालने का प्रकार यह है कि जो वारेश हो उससे पाँचवें से गिनना प्रारम्भ करते हैं। मान लीजिये रविवार की रात्रि को मान्दि निकालना है। रात्रि के आठ भाग कीजिये। सूर्यास्त के बाद प्रथम भाग बृहस्पति का (पहले बता चुके हैं कि वारेश से पाँचवें वार में गिनना चाहिये-- सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, इस प्रकार सूर्य से पाँचवाँ बृहस्पति
पच्चीसवाँ अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६०३ होने के कारण बृहस्पति से प्रारम्भ किया।) हुआ, दूसरा शुक्र का, तीसरा शनि का। मान लीजिये रात्रिमान ३२ घड़ी है तो प्रत्येक भाग ४-४ घड़ी का हुआ और ४ × ३ = १२ घड़ी पर शनि का भाग समाप्त हुआ। सूर्यास्त के १२ घड़ी बाद किस लग्न का कौन-सा अंश उदित होता है ? यही मान्दि स्पष्ट होगा। यमघंटक, अर्द्ध प्रहार और काल अब यम कंटक, अर्द्ध प्रहार और काल निकालना बताते हैं । यमकंटक अर्द्धप्रहार काल रविवार १८ घड़ी बाद १४ घड़ी बाद २ घड़ी बाद सोमवार १४ ,, १० ,, २६ ,, मंगलवार १० ,, ६, ,, २२ ,, बुधवार ६ ,, २ ,, १८ ,, बृहस्पतिवार २ ,, २६ ,, १४ ,, शुक्रवार २६ ,, २२ ,, १० ,, शनिवार २२ ,, १८ ,, ६ ,, ऊपर जो घड़ियां दी गयी हैं वह यह मान कर कि दिनमान तीस घड़ी है। यदि दिनमान कम या ज्यादा हो तो ऊपर के समय में भी अनुपात से अन्तर कर लेना चाहिए । ॥३, ४॥ धूम, व्यतीपात, परिवेश (परिधि) इन्द्रचाप, उपकेतु सूर्यस्पष्ट में ४ राशि १३ अंश और २० कला जोड़ने से धूम- स्पष्ट निकल आता है। यदि १२ राशियों में से धूम-स्पष्ट कम किया
६०४ फलदीपिका जाय तो व्यतीपात निकल आता है। व्यतीपात में ६ राशि जोड़ने से परिधि की स्थिति मालूम हो जाती है। परिधि को ही परिवेष भी कहते हैं। यदि परिवेष को बारह राशियों में से घटाया जाय तो इंद्रचाप निकल आता है। इंद्रचाप में १६ अंश, ४० कला जोड़ने से उपकेतु की स्थिति मालूम हो जाती है। उपकेतु में एक राशि जोड़ने से सूर्य स्पष्ट आ जाता है। मान लीजिये किसी का सूर्य वृश्चिक राशि के २६ अंश पर है, तो (i) सूर्य = ७-२६ जोड़िये + ४-१३-२० १२-९-२० = ०-९-२० = धूम (ii) बारह राशि में से = १२- ०- ० घटाइये धूम - ०-९-२० = ११-२०-४० = व्यतीपात (iii) व्यतीपात = ११-२०-४० ६ राशि जोड़िये + ६- ०- ० १७-२०-४० = ५-२०-४० = परिवेष (iv) बारह राशि में से = १२- ०- ० घटाइये परिवेष - ५-२०-४० = ६- ९-२० = इंद्रचाप (v) *इंद्रचाप में = ६- ९-२० जोड़िये + १६-४० ६-२६- ० = केतु या उपकेतु *यह केतु—राहु केतु वाला केतु नहीं है किन्तु केतु नामक उप- ग्रह है।
पच्चीसवाँ अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६०५ (vi) केतु या उपकेतु में = ६–२६– ० जोड़िये + १– ०– ० ७–२६– ० = सूर्य स्पष्ट जहां योग १२ राशि से अधिक आवे—वहां उन राशियों में से १२ घटा देना चाहिये । जैसे १२–९–२० में १२ घटाया तो ०–९–२० बचा अर्थात् मेष राशि के ९ अंश २० कला । भावाध्याये पूर्वमेव मया प्रोक्तं समुच्चयम् । मुक्तानां यत्तदेवात्र वाच्यं भावफलं दृढम् ॥६॥ तथापि गुलिकादीनां विशेषोऽत्र निगद्यते । पूर्वाचार्यैर्यदाख्यातं तत्संगृह्य मयोदितम् ॥७॥ पहले यह बता चुके हैं कि किन कारणों से भाव बिगड़ता है और किन कारणों से भाव सुधरता है । सामुदायिक रूप से भाव विचार पिछले अध्यायों में बताया जा चुका है । अब गुलिक आदि का भाव फल बताते हैं। पहले के आचार्यों ने गुलिक आदि का जो फल बताया है वही संग्रह करके बताया जाता है ॥७॥ चोरः क्रूरो विनयरहितो वेदशास्त्रार्थहीनो नातिस्थूलो नयनविकृतो नातिधीर्नातिपुत्रः । नाल्पाहारी सुखविरहितो लम्पटो नातिजीवी शूरो न स्यादपि जडमतिः कोपनो मान्दिलग्ने ॥८॥ न चाटुवाक्यं कलहायमानो न वित्तधान्यं परदेशवासी । न वाङ् न सूक्ष्मार्थविवादवाक्यो दिनेशपौत्रे धनराशिसंस्थे ॥९॥
६०६ फलदीपिका विरहगर्वमदादिगुणैर्युतः प्रचुरकोपधनार्जनसंभ्रमः । विगतशोकभयश्च विसोदरः सहजधामनि मन्दसुतो यदा ॥१०॥ सुहृदि शनिसुते स्याद्बन्धुयानार्थहीन- श्चलमतिरवबुद्धिस्त्वल्पजीवी च पुत्रे । बहुरिपुगणहन्ता भूतविद्याविनोदी रिपुगतगुलिके सच्छ्रेष्ठपुत्रः स शूरः ॥११॥ कलत्रसंस्थे गुलिके कलही बहुभार्यकः । लोकद्वेषी कृतघ्नश्च स्वल्पज्ञः स्वल्पकोपनः ॥१२॥ विकलनयनवक्त्रो ह्रस्वदेहोऽष्टमस्थे गुरुसुतवियुतोऽभ द्धर्मसंस्थेऽर्कपौत्रे न शुभफलदकर्मा कर्मसंस्थे विदानः सुखसुतमतितेजः कान्तिमाँल्लाभसंस्थे ॥१३॥ विषयविरहितो दीनो बहुव्ययः स्याद्व्यये गुलिकसंस्थे । गुलिकत्रिकोणभे वा जन्म ब्रूयान्नवांशे वा ॥१४॥ (i) यदि गुलिक लग्न में हो तो जातक चोर, क्रूर, विनयरहित होता है । वह अति मोटा नहीं होता । उसके नेत्रों में विकार होता है । पुत्र विशेष नहीं होते और बुद्धि कम होती है । ऐसा व्यक्ति वेदों और शास्त्रों का अध्ययन नहीं करता । जातक भोजन अधिक करता है
पच्चीसवां अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६०७ किन्तु दुःखी रहता है और दीर्घायु नहीं होता । ऐसा व्यक्ति क्रोधी, मूर्ख और भीरु प्रकृति का होता है। जातक विषय वासना में लिप्त, लम्पट स्वभाव का होता है ॥८॥ (ii)यदि गुलिक द्वितीय स्थान में हो तो जातक दूसरों को प्रसन्न करने वाले वचन नहीं बोलता । ऐसा व्यक्ति लोगों से प्रायः कलह करता रहता है । जातक के पास धन और धान्य की कमी रहती है और परदेश में अधिक रहता है । अपनी बात का पाबन्द नहीं होता और जिस विषय में बातचीत करने के लिये बहुत सूक्ष्म बुद्धि की आवश्यकता है उन विषयों में जातक वाद-विवाद करने में अक्षम होता है । कहने का तात्पर्य यह है कि जातक स्थूल बुद्धि का होता है और जिन विषयों पर बात करने के लिये कुशाग्र बुद्धि की आवश्यकता है उन विषयों में उसकी वाणी नहीं चलती ॥९॥ (iii) यदि गुलिक तीसरे घर में हो तो जातक घमण्डी, स्वभाव का, क्रोधी और लोभी होता है। ऐसा व्यक्ति प्रायः अकेला रहना पसन्द करता है । उसमें बहुत अधिक मद होता है अथवा मद-प्रिय (शराब का शौकीन) होता है। ऐसे व्यक्ति को भाई बहिन का सुख कम होता है । जातक स्वयं भयहीन, शोकहीन होता है । धन उपार्जन करने में उसका बहुत ठाट-बाट दिखाई देता है ॥१०॥ (iv) यदि गुलिक चौथे घर में हो तो जातक बन्धुहीन और धन- हीन होता है और उसे सवारी का सुख प्राप्त नहीं होता है । (v) यदि गुलिक पाँचवें घर में हो तो जातक दुष्ट बुद्धि का होता है और किसी एक विचार पर दृढ़ नहीं रहता । वह अधिक समय तक जीवित भी नहीं रहता । (vi) यदि गुलिक छठे घर में हो तो जातक भूत-विद्या का शौकीन होता है । जो व्यक्ति डाकिनी, शाकिनी, यक्षिणी, भूत, प्रेत आदि की आराधना कर उनसे काम निकालते हैं उन्हें भूत विद्या का प्रेमी कहते हैं । जिसके छठे घर में गुलिक होता है वह बहुत शूरवीर होता
६०८ फलदीपिका है और अपने शत्रुओं को परास्त कर देता है। ऐसे जातक का पुत्र बहुत श्रेष्ठ (उत्तम) होता है। (vii) यदि गुलिक सातवें घर में हो तो जातक कलह करने वाला और लोक-द्वेषी होता है। ऐसा व्यक्ति थोड़ा समझने वाला, थोड़ा क्रोध करने वाला और कृतघ्न होता है। जातक की अनेक भार्यायें होती हैं ॥१२॥ (viii) यदि गुलिक अष्टम स्थान में हो तो जातक का शरीर छोटा होता है। चेहरे और नेत्रों में कोई विकलता की बात होती है। अर्थात् या तो कोई शारीरिक कमी हो या वाक् शक्ति में कुछ दोष हो। (ix) यदि नवें घर में गुलिक हो तो जातक अपने गुरु (गुरु, पिता आदि) तथा पुत्र से हीन होता है। (x) यदि दशम में गुलिक हो तो जातक शुभ कर्मों का परि- त्याग करता है और दानशील नहीं होता। (xi) यदि ग्यारहवें घर में गुलिक हो तो जातक सुखी, अति तेजस्वी और कान्तिवान् होता है। तथा उसे पुत्र सुख भी प्राप्त होता है ॥१३॥ (xii) यदि गुलिक बारहवें घर में हो तो जातक विषय युक्त से रहित, दीन और बहुत व्यय करने वाला होता है। अब एक दूसरा विषय प्रारम्भ करते हैं। जातक का जन्म लग्न या जन्म राशि वही होगी जो (१) गुलिक जिस राशि में है उससे त्रिकोण में हो या (२) जिस नवांश में मान्दि हो वह लग्न हो ॥१४॥ रवियुक्ते पितृहन्ता मातृक्लेशी निशापसंयुक्ते। भ्रातृवियोगः सकुजे बुधयुक्ते मन्दजे च सोन्मादी ॥१५॥
पच्चीसवां अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६०९ गुरुयुक्ते पाषण्डी शुक्रयुते नीचकामिनीसङ्गः । शनियुक्ते शनिपुत्रे कुष्ठव्याध्यर्दितश्च सोऽल्पायुः ॥१६॥ विषरोगी राहुयुते शिखियुक्ते वह्निपीडितो मान्दौ । गुलिकस्त्याज्ययुतश्चेत्तस्मिञ्जातो नृपोऽपि भिक्षाशी ॥१७॥ गुलिकस्य तु संयोगे दोषान्सर्वत्र निर्दिशेत् । यमकण्टकसंयोगे सर्वत्र कथयेच्छुभम् ॥१८॥ अब जन्म कुंडली में गुलिक के अन्य ग्रहों के साथ बैठने का फल बताते हैं। गुलिक जिस ग्रह के साथ बैठता है प्रायः उस ग्रह को दूषित करता है । सूर्य पिता का कारक है इसलिये यदि गुलिक सूर्य के साथ बैठे तो जातक के पिता को मार दे अर्थात् पिता अल्पायु हो; चन्द्रमा मातृ कारक है इसलिये यदि गुलिक चन्द्रमा के साथ बैठे तो जातक की माता को कष्ट करे; मंगल भ्रातृ कारक है इसलिये मंगल के साथ गुलिक बैठे तो भाई से वियोग करावे; बुध बुद्धि कारक है इस कारण बुध और गुलिक एक साथ बैठे तो जातक को उन्माद--पागलपन का रोग हो जाता है ॥१५॥ बृहस्पति धर्म कारक है; इस कारण यदि बृहस्पति और गुलिक एक साथ हों तो जातक पाखंडी होता है। शुक्र स्त्रीकारक है और यदि शुक्र तथा गुलिक एक साथ हों तो जातक नीच स्त्रियों के साथ समागम करता है। यदि गुलिक शनि के साथ हो तो जातक कुष्ठ, व्याधि आदि से पीड़ित और अल्पायु होता है ॥१६॥ यदि राहु और गुलिक एक साथ हों तो विष रोगी हो (किसी प्रकार के विष के शरीर में उत्पन्न होने से जो रोग होते हैं) । यदि केतु और गुलिक एक साथ हों तो जातक अग्नि से पीड़ित हो। यदि
६१० फलदीपिका जिस दिन जातक का जन्म हुआ है उस दिन 'मुलिक' त्याज्यकाल* में पड़े तो ऐसा जातक चाहे राजघराने में भी पैदा हुआ हो किन्तु भीख मांगता है—अर्थात् दरिद्र होता है ॥१७॥ *“त्याज्ययुते” मूल संस्कृत श्लोक में यह शब्द आया है। इसकी परिभाषा किसी ने नहीं की है कि त्याज्य (काल) से क्या अभि- प्राय है :— हमारे विचार से निम्नलिखित त्याज्यकाल हैं। (क) विषघटी—यदि मान लिया जावे कि प्रत्येक नक्षत्र में ६० घड़ी होती हैं तो अश्विनी ५० घड़ी से ५४ घड़ी भरणी २४ ,, २८ ,, कृत्तिका ३० ,, ३४ ,, रोहिणी ४० ,, ४४ ,, मृगशिर १४ ,, १८ ,, आर्द्रा २१ ,, २५ ,, पुनर्वसु ३० ,, ३४ ,, पुष्य २० ,, २४ ,, आश्लेषा ३२ ,, ३६ ,, मघा ३० ,, ३४ ,, पूर्वा फाल्गुनी २० ,, २४ ,, उत्तरा फाल्गुनी १८ ,, २२ ,, हस्त २१ ,, २५ ,, चित्रा २० ,, २४ ,, स्वाती १४ ,, १८ ,, विशाखा १४ ,, १८ ,, अनुराधा १० ,, १४ ,, ज्येष्ठा १४ ,, १८ ,,
पच्चीसवां अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६११ दोषप्रदाने गुलिको बलीयान् शुभंप्रदाने यमकण्टकः स्यात् । अन्ये च सर्वे व्यसनप्रदाने मान्द्युक्तवीर्यार्द्ध बलान्विताः स्युः ॥१९॥ शनिवद्गुलिके प्रोक्तं गुरुवद्यमकण्टके । अर्धप्रहारे बुधवत्फलं काले तु राहुवत् ॥२०॥ मूल ५६ ,, ६० ,, पूर्वाषाढ २४ ,, २८ ,, उत्तराषाढ २० ,, २४ ,, श्रवण १० ,, १४ ,, धनिष्ठा १० ,, १४ ,, शतभिषा १८ ,, २२ ,, पूर्वाभाद्र १६ ,, २० ,, उत्तराभाद्र २४ ,, २८ ,, रेवती ३० ,, ३४ ,, (ख) व्यतीपात तथा वैधृति योग भी त्याज्य है (ग) भद्राकरण त्याज्य है (घ) क्षय तिथि (ङ) वृद्धि तिथि (च) कुलिक, अर्धयाम पातयोग विष्कुंभ और वज्र (छ) (i) परिघयोग का पूर्वार्ध (ii) गंड योग में ६ घड़ी (iii) व्याघात में ९ घड़ी त्याज्य काल यह सब हैं। परन्तु इस प्रकरण में नक्षत्र घटी, के त्याज्य काल लागू करने चाहिये ।
६१२ फलदीपिका कालस्तु राहुर्गु लिकस्तु मृत्यु- र्जीवातुकः स्याद्यमकण्टकोपि । अर्द्धप्रहारः शुभदः शुभाङ्क- युक्तोऽन्यथा चेदशुभं विदध्यात् ॥२१॥ , आत्मादयोऽधिपैर्युक्ता धूमादिग्रहसंयुताः । ते भावा नाशतां यान्ति वदतीति पराशरः ॥२२॥ धूमे सन्ततमुष्णं स्यादग्निभीतिर्मनोव्यथा । व्यतीपाते मृगभयं चतुष्पान्मरणं तु वा ॥२३॥ परिवेषे जले भीरुर्जलरोगश्च बन्धनम् । इन्द्रचापे शिलाघातः क्षतं शस्त्रैरपि च्युतिः ॥२४॥ केतौ पतनघाताद्यं कार्यनाशोऽशनेर्भयम् । एते यद्भावसहितास्तद्दशायां फलं वदेत् ॥२५॥ (i) गुलिक के संयोग से सर्वत्र दोष होते हैं । ऊपर बता चुके हैं कि छठे और ग्यारहवें भाव को छोड़कर जिस घर में गुलिक बैठता है उसके शुभ फल को नष्ट करता है—अशुभ फल को बढाता है । (ii) यम कंटक का फल यह है कि जिस ग्रह के साथ यम कष्टक बैठे उस ग्रह के शुभ फल को बढ़ावे-जिस भाव में यम कंटक बैठे उस भाव के शुभ फल में वृद्धि करे ॥१८॥ (iii) दोष युक्त करने में—अशुभ फल बढ़ाने में गुलिक बलवान् होता है । शुभ फल प्रदान करने में यम कंटक बली है । अन्य जो उपग्रह हैं वह दुष्ट फल देने वाले हैं किन्तु जितना दुष्ट फल मान्दि देता है अन्य ग्रह केवल उसका आधा दुष्ट फल देते हैं । मान लीजिये मान्दि
पच्चीसवां अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६१३ १६ आना अशुभ फल प्रदान करता है तो ‘काल’ ‘केतु’ आदि केवल आठ आना अशुभ फल देते हैं ॥१९॥ (iv) गुलिक का प्रभाव शनि के सदृश होता है। यमकंटक का बृहस्पति के सदृश। अर्धप्रहार का फल बुध की तरह समझना चाहिये और ‘काल’ का राहु के सदृश ॥२०॥ (v) काल का प्रभाव राहु के सदृश होता है । अर्थात् यदि किसी भाव में काल हो तो वही फल कहना जो उस भाव में यदि राहु रहता तो कहते । गुलिक साक्षात् ‘मृत्यु’ है। यमकंटक में बृहस्पति की भांति जीवन प्रदायिनी शक्ति है । जिस भाव में अधिक शुभ बिन्दु हों-उसमें यदि अर्धप्रहार बैठे तो शुभ फल प्रदान करता है । यदि अर्ध प्रहार ऐसे घर में बैठे जिसमें-सर्वाष्टक वर्ग में अधिक शुभ बिन्दु न हों तो अर्धप्रहार शुभ फल नहीं करेगा ॥२१॥ (vi) पराशर ऋषि का कथन है कि लग्न आदि भाव और लग्नेश आदि भावेश जो भी धूम आदि उपग्रहों से युत होते हैं-वे नाश को प्राप्त होते हैं । अन्य उपग्रह क्रूर फल देने वाले हैं किन्तु यमकंटक शुभ फल देने वाला है, यह स्मरण रखना चाहिये ॥२२॥ (vii) ‘धूम’ जलन, उष्णता, अग्नि से भय और चित्त को व्यथा उत्पन्न करता है। ‘व्यतीपात’ सींग वाले जानवरों से भय और किसी चौपाये से मृत्यु कराने वाला होता है ॥२३॥ (viii) ‘परिवेष’ या परिधि जातक में जल से भय उत्पन्न करता है । अर्थात् जिसके लग्न में परिवेष या परिधि हो वह नदी या तालाब में घुस कर स्नान करने से डरेगा। ऐसे जातक को जल रोग (जलोदर या शरीर के किसी अन्य भाग में पानी इकट्ठा हो जाने की बीमारी) होने का भी अन्देशा होता है । जातक को बन्धन (गिरफ्तारी, जेल *संस्कृत में बृहस्पति को 'जीव' कहते हैं ।
६१४ फलदीपिका जाना) का भी भय होता है। इन्द्रचाप पत्थर से या शस्त्र से चोट लगवाता है या जातक किसी मकान, सवारी या पेड़ से गिर पड़े । (ix) उपकेतु पतन (गिरना) घात (चोट आदि) करता है। वज्र से भय होगा-अर्थात् ऐसे व्यक्ति पर बिजली गिरने का भय हो । ग्रह कार्य का नाश करने वाला उपग्रह है। (x) ऊपर जो फल बताये गये हैं वह किस दशा में होंगे ? क्योंकि उपग्रहों की तो दशा होती नहीं--जिस भाव में उपग्रह हों उस भावेश की दशा में उपग्रह का फल होगा । अर्थात् मान लीजिये कोई उपग्रह अष्टम में है तो अष्टमेश की दशा में इस उपग्रह का फल होगा ।२५॥ अल्पायुः कुमुखः पराक्रमगुणो दुःखी च नष्टात्मजः प्रत्यर्थिक्षुभितो विशीर्णमदनो दुर्मार्गमृत्युं गतं । धर्मादिप्रतिकूलताटनरुचिर्लाभान्वितो दोषवा- नित्येवं क्रमशो विलग्नभवनात्केतोः फलं कीर्तयेत् ॥२॥ उपकेतु यदि लग्न आदि द्वादश भावों में से किसी में हो तो भाव- फल क्रमशः निम्नलिखित है: (१) अल्पायु (२) खराब मुख हो (३) पराक्रमी (४) दुःखी (५) सन्तान नष्ट हो जावे (६) शत्रुओं से पीड़ित (७) पुंस्त्व में कमी हो जावे (८) दुर्भाग्य से मृत्यु को प्राप्त हो (९) धर्म से प्रतिकूलता (१०) घूमने फिरने का शौकीन (११) लाभ (१२) दोषवान् ॥२६॥ अप्रकाशाः संचरन्ति धूमाद्याः पंच खेचराः। क्वचित्कदाचिद्द्दृश्यन्ते लीकोपद्रवहेतवे ॥२७॥
पच्चीसवां अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६१५ धूम आदि पांच उपग्रह-धूम, व्यतीपात, परिवेष, इन्द्रचाप, उपकेतु- यह बिना दिखाई देते हुए ही आकाश में संचार करते हैं । अर्थात् जैसे सूर्य, चन्द्र आदि सात ग्रह दिखाई देते हैं उस प्रकार यह पाँच उप- ग्रह दिखाई नहीं देते । यह उपग्रह (धूम आदि) कभी-कभी कहीं-कहीं दिखाई दे जाते हैं । जब यह कहीं दिखाई दें तो समझिये कि लोक में कुछ उपद्रव होगा अर्थात् जिस देश में या प्रदेश में दिखाई दें उसमें कुछ दुर्घटना घटित होगी ॥२७॥ धूमस्तु धूमपटलः पुच्छर्क्षमिति केचन । उल्कापातो व्यतीपातः परिवेषस्तु दृश्यते ॥२८॥ कुछ लोग कहते हैं कि "धूम" धुएं का समूह है किन्तु अन्य लोगों के विचार से यह पूंछ वाला तारा या पुच्छल तारा है । उल्कापात तारे के गिरने की तरह व्यतीपात होता है । परिवेष-सूर्य या चन्द्रमा के चारों ओर गोल मंडल के रूप में दिखाई देता है ॥२८ लोके प्रसिद्धं यद्दृष्टं तदेवेन्द्रधनुः स्मृतम् । केतुश्च धूमकेतुः स्याल्लोकोपद्रवकारकः ॥२९॥ दिन में वर्षा के बाद (जैसे दोपहर में वर्षा समाप्त हो गई तो उसके बाद) आकाश में सात रंग का धनुष जो कभी-कभी दिखाई दे जाता है और जिसे लौकिक भाषा में इन्द्र धनुष कहते हैं-वही "इन्द्र चाप" है । 'केतु' धूम केतु को कहते हैं । यह लोक में उपद्रव- कारक है ॥२९॥ —————— यह केतु—राहु केतु वाले केतु से भिन्न है।
६१६ फलदीपिका गुलिकभवननाथे केन्द्रगे वा त्रिकोणे बलिनि निजगृहस्थे स्वोच्चमित्रस्थिते वा । रथगजतुरगाणां नायको मारतुल्यो महितपृथुयशास्स्यान्मेदिनीमण्डलेन्द्रः ॥३०॥ जिस घर में गुलिक है-उस घर का स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हो, बली हो, अपने घर या अपनी उच्च राशि या मित्रराशि में हो तो जातक बहुत सुन्दर, यशस्वी और पृथ्वी का स्वामी होता है ॥३०॥
छब्बीसवाँ अध्याय गोचरफल सर्वेषु लग्नेष्वपि सत्सु चन्द्र- लग्नं प्रधानं खलु गोचरेषु । तस्मात्तदृक्षादपि वर्तमान- ग्रहेन्द्रचारैः कथयेत्फलानि ॥१॥ यद्यपि जन्म कुंडली में जन्म लग्न से, सूर्य को लग्न मानकर (अर्थात् सूर्य जिस राशि में हो उसे लग्न मानकर) या अन्यग्रह जिस राशि में हों-उन्हें लग्न मानकर विचार किया जा सकता है किन्तु गोचर फलादेश में चन्द्र लग्न की प्रधानता है । इसलिये-जिस समय का विचार करना हो उस समय चन्द्र राशि से (जिस जातक की कुंडली का विचार करना हो उसके जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि में हो-उसको लग्न मानकर- इसे ही चन्द्र लग्न कहते हैं-उस चन्द्र लग्न से) कौन सा ग्रह कहाँ जा रहा है-वह शुभ फल करेगा या अनिष्ट फल करेगा-इसका विचार करना चाहिये ॥१॥ तेईसवें अध्याय में प्रत्येक ग्रह से तथा जन्म लग्न से गोचर का विचार अष्टक वर्ग द्वारा बतलाया गया है । अष्टक का अर्थ है आठ । लग्न तथा सात ग्रह-सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि इन आठों से विचार करके रेखा या बिन्दु लगाकर यह देखा जाता
६१८ फलदीपिका है कि आठ में से-कितनों से गोचरवश ग्रह अच्छा है-कितने से अनिष्ट है-अधिक से अच्छा और थोड़े ग्रहों से निकृष्ट हुआ तो परिणाम में शुभ, और यदि अधिक ग्रहों से-उनकी जन्मकालीन राशि स्थिति से गिनने पर अशुभ हुआ और थोड़े ग्रहों से शुभ तो परिणाम में अशुभ । चौबीसवें अध्याय में सूर्य राशि (जन्म कुंडली में सूर्य जिस राशि से बैठा है) से नवम राशि से पिता का विचार करना; चन्द्र राशि (जन्म कुंडली में चन्द्रमा जिस राशि में बैठा हो) से चतुर्थ राशि से माता का विचार करना, मंगल राशि (जिस राशि में जन्म कुंडली में मंगल बैठा हो) से तृतीय जो राशि हो उससे भाई का विचार करना. इस प्रकार सूर्य, लग्न, चन्द्र लग्न, मंगल लग्न आदि प्रत्येक ग्रह स्थिति को लग्न मान उससे नवीं, चौथी, तृतीय आदि राशियों से, गोचर विचार बतलाया गया है। अब छब्बीसवें अध्याय में चन्द्र लग्न को प्रधान मान- कर गोचर विचार क्यों बताया गया ? ऐसी शंका होना स्वाभाविक है । इसका कारण यह है कि चन्द्रमा मन है । वेदों में लिखा है “:चन्द्रमा मनसो जातः” चन्द्रमा उस विराट् पुरुष परब्रह्म परमेश्वर के मन से उत्पन्न हुआ । अर्थात् मन का अधिष्ठाता चन्द्रमा है । अंग्रेजी में चन्द्रमा को लूना कहते हैं । लूना से ही लूनैसी शब्द बना है-जिसका अर्थ है पागलपन । मन विक्षिप्त हो जाने से पागलपन होता है । सुख-दुःख का अनुभव मन ही करता है। अन्य ग्रहों का प्रभाव- मनुष्य पर मन के द्वारा ही पड़ता है—इसीलिए वराहमिहिर ने अपने बृहज्जातक अध्याय २ श्लोक १ में लिखा है । मनस्तुहितगुः अर्थात् चन्द्रमा मन है । इसी कारण चन्द्र लग्न को गोचर फलादेश में प्रधान माना गया है । बहुत से जातकों की कुंडली में जन्म लग्न की अपेक्षा यदि चन्द्र लग्न बलवान् हो तो चन्द्र लग्न को ही लग्न मान कर फलादेश किया