भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 608

पच्चीसवां अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६०७ किन्तु दुःखी रहता है और दीर्घायु नहीं होता । ऐसा व्यक्ति क्रोधी, मूर्ख और भीरु प्रकृति का होता है। जातक विषय वासना में लिप्त, लम्पट स्वभाव का होता है ॥८॥ (ii)यदि गुलिक द्वितीय स्थान में हो तो जातक दूसरों को प्रसन्न करने वाले वचन नहीं बोलता । ऐसा व्यक्ति लोगों से प्रायः कलह करता रहता है । जातक के पास धन और धान्य की कमी रहती है और परदेश में अधिक रहता है । अपनी बात का पाबन्द नहीं होता और जिस विषय में बातचीत करने के लिये बहुत सूक्ष्म बुद्धि की आवश्यकता है उन विषयों में जातक वाद-विवाद करने में अक्षम होता है । कहने का तात्पर्य यह है कि जातक स्थूल बुद्धि का होता है और जिन विषयों पर बात करने के लिये कुशाग्र बुद्धि की आवश्यकता है उन विषयों में उसकी वाणी नहीं चलती ॥९॥ (iii) यदि गुलिक तीसरे घर में हो तो जातक घमण्डी, स्वभाव का, क्रोधी और लोभी होता है। ऐसा व्यक्ति प्रायः अकेला रहना पसन्द करता है । उसमें बहुत अधिक मद होता है अथवा मद-प्रिय (शराब का शौकीन) होता है। ऐसे व्यक्ति को भाई बहिन का सुख कम होता है । जातक स्वयं भयहीन, शोकहीन होता है । धन उपार्जन करने में उसका बहुत ठाट-बाट दिखाई देता है ॥१०॥ (iv) यदि गुलिक चौथे घर में हो तो जातक बन्धुहीन और धन- हीन होता है और उसे सवारी का सुख प्राप्त नहीं होता है । (v) यदि गुलिक पाँचवें घर में हो तो जातक दुष्ट बुद्धि का होता है और किसी एक विचार पर दृढ़ नहीं रहता । वह अधिक समय तक जीवित भी नहीं रहता । (vi) यदि गुलिक छठे घर में हो तो जातक भूत-विद्या का शौकीन होता है । जो व्यक्ति डाकिनी, शाकिनी, यक्षिणी, भूत, प्रेत आदि की आराधना कर उनसे काम निकालते हैं उन्हें भूत विद्या का प्रेमी कहते हैं । जिसके छठे घर में गुलिक होता है वह बहुत शूरवीर होता