फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६०६ फलदीपिका विरहगर्वमदादिगुणैर्युतः प्रचुरकोपधनार्जनसंभ्रमः । विगतशोकभयश्च विसोदरः सहजधामनि मन्दसुतो यदा ॥१०॥ सुहृदि शनिसुते स्याद्बन्धुयानार्थहीन- श्चलमतिरवबुद्धिस्त्वल्पजीवी च पुत्रे । बहुरिपुगणहन्ता भूतविद्याविनोदी रिपुगतगुलिके सच्छ्रेष्ठपुत्रः स शूरः ॥११॥ कलत्रसंस्थे गुलिके कलही बहुभार्यकः । लोकद्वेषी कृतघ्नश्च स्वल्पज्ञः स्वल्पकोपनः ॥१२॥ विकलनयनवक्त्रो ह्रस्वदेहोऽष्टमस्थे गुरुसुतवियुतोऽभ द्धर्मसंस्थेऽर्कपौत्रे न शुभफलदकर्मा कर्मसंस्थे विदानः सुखसुतमतितेजः कान्तिमाँल्लाभसंस्थे ॥१३॥ विषयविरहितो दीनो बहुव्ययः स्याद्व्यये गुलिकसंस्थे । गुलिकत्रिकोणभे वा जन्म ब्रूयान्नवांशे वा ॥१४॥ (i) यदि गुलिक लग्न में हो तो जातक चोर, क्रूर, विनयरहित होता है । वह अति मोटा नहीं होता । उसके नेत्रों में विकार होता है । पुत्र विशेष नहीं होते और बुद्धि कम होती है । ऐसा व्यक्ति वेदों और शास्त्रों का अध्ययन नहीं करता । जातक भोजन अधिक करता है