भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 606

पच्चीसवाँ अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६०५ (vi) केतु या उपकेतु में = ६–२६– ० जोड़िये + १– ०– ० ७–२६– ० = सूर्य स्पष्ट जहां योग १२ राशि से अधिक आवे—वहां उन राशियों में से १२ घटा देना चाहिये । जैसे १२–९–२० में १२ घटाया तो ०–९–२० बचा अर्थात् मेष राशि के ९ अंश २० कला । भावाध्याये पूर्वमेव मया प्रोक्तं समुच्चयम् । मुक्तानां यत्तदेवात्र वाच्यं भावफलं दृढम् ॥६॥ तथापि गुलिकादीनां विशेषोऽत्र निगद्यते । पूर्वाचार्यैर्यदाख्यातं तत्संगृह्य मयोदितम् ॥७॥ पहले यह बता चुके हैं कि किन कारणों से भाव बिगड़ता है और किन कारणों से भाव सुधरता है । सामुदायिक रूप से भाव विचार पिछले अध्यायों में बताया जा चुका है । अब गुलिक आदि का भाव फल बताते हैं। पहले के आचार्यों ने गुलिक आदि का जो फल बताया है वही संग्रह करके बताया जाता है ॥७॥ चोरः क्रूरो विनयरहितो वेदशास्त्रार्थहीनो नातिस्थूलो नयनविकृतो नातिधीर्नातिपुत्रः । नाल्पाहारी सुखविरहितो लम्पटो नातिजीवी शूरो न स्यादपि जडमतिः कोपनो मान्दिलग्ने ॥८॥ न चाटुवाक्यं कलहायमानो न वित्तधान्यं परदेशवासी । न वाङ् न सूक्ष्मार्थविवादवाक्यो दिनेशपौत्रे धनराशिसंस्थे ॥९॥