भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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६१४ फलदीपिका जाना) का भी भय होता है। इन्द्रचाप पत्थर से या शस्त्र से चोट लगवाता है या जातक किसी मकान, सवारी या पेड़ से गिर पड़े । (ix) उपकेतु पतन (गिरना) घात (चोट आदि) करता है। वज्र से भय होगा-अर्थात् ऐसे व्यक्ति पर बिजली गिरने का भय हो । ग्रह कार्य का नाश करने वाला उपग्रह है। (x) ऊपर जो फल बताये गये हैं वह किस दशा में होंगे ? क्योंकि उपग्रहों की तो दशा होती नहीं--जिस भाव में उपग्रह हों उस भावेश की दशा में उपग्रह का फल होगा । अर्थात् मान लीजिये कोई उपग्रह अष्टम में है तो अष्टमेश की दशा में इस उपग्रह का फल होगा ।२५॥ अल्पायुः कुमुखः पराक्रमगुणो दुःखी च नष्टात्मजः प्रत्यर्थिक्षुभितो विशीर्णमदनो दुर्मार्गमृत्युं गतं । धर्मादिप्रतिकूलताटनरुचिर्लाभान्वितो दोषवा- नित्येवं क्रमशो विलग्नभवनात्केतोः फलं कीर्तयेत् ॥२॥ उपकेतु यदि लग्न आदि द्वादश भावों में से किसी में हो तो भाव- फल क्रमशः निम्नलिखित है: (१) अल्पायु (२) खराब मुख हो (३) पराक्रमी (४) दुःखी (५) सन्तान नष्ट हो जावे (६) शत्रुओं से पीड़ित (७) पुंस्त्व में कमी हो जावे (८) दुर्भाग्य से मृत्यु को प्राप्त हो (९) धर्म से प्रतिकूलता (१०) घूमने फिरने का शौकीन (११) लाभ (१२) दोषवान् ॥२६॥ अप्रकाशाः संचरन्ति धूमाद्याः पंच खेचराः। क्वचित्कदाचिद्द्दृश्यन्ते लीकोपद्रवहेतवे ॥२७॥