फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपच्चीसवां अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६१३ १६ आना अशुभ फल प्रदान करता है तो ‘काल’ ‘केतु’ आदि केवल आठ आना अशुभ फल देते हैं ॥१९॥ (iv) गुलिक का प्रभाव शनि के सदृश होता है। यमकंटक का बृहस्पति के सदृश। अर्धप्रहार का फल बुध की तरह समझना चाहिये और ‘काल’ का राहु के सदृश ॥२०॥ (v) काल का प्रभाव राहु के सदृश होता है । अर्थात् यदि किसी भाव में काल हो तो वही फल कहना जो उस भाव में यदि राहु रहता तो कहते । गुलिक साक्षात् ‘मृत्यु’ है। यमकंटक में बृहस्पति की भांति जीवन प्रदायिनी शक्ति है । जिस भाव में अधिक शुभ बिन्दु हों-उसमें यदि अर्धप्रहार बैठे तो शुभ फल प्रदान करता है । यदि अर्ध प्रहार ऐसे घर में बैठे जिसमें-सर्वाष्टक वर्ग में अधिक शुभ बिन्दु न हों तो अर्धप्रहार शुभ फल नहीं करेगा ॥२१॥ (vi) पराशर ऋषि का कथन है कि लग्न आदि भाव और लग्नेश आदि भावेश जो भी धूम आदि उपग्रहों से युत होते हैं-वे नाश को प्राप्त होते हैं । अन्य उपग्रह क्रूर फल देने वाले हैं किन्तु यमकंटक शुभ फल देने वाला है, यह स्मरण रखना चाहिये ॥२२॥ (vii) ‘धूम’ जलन, उष्णता, अग्नि से भय और चित्त को व्यथा उत्पन्न करता है। ‘व्यतीपात’ सींग वाले जानवरों से भय और किसी चौपाये से मृत्यु कराने वाला होता है ॥२३॥ (viii) ‘परिवेष’ या परिधि जातक में जल से भय उत्पन्न करता है । अर्थात् जिसके लग्न में परिवेष या परिधि हो वह नदी या तालाब में घुस कर स्नान करने से डरेगा। ऐसे जातक को जल रोग (जलोदर या शरीर के किसी अन्य भाग में पानी इकट्ठा हो जाने की बीमारी) होने का भी अन्देशा होता है । जातक को बन्धन (गिरफ्तारी, जेल *संस्कृत में बृहस्पति को 'जीव' कहते हैं ।