भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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६१२ फलदीपिका कालस्तु राहुर्गु लिकस्तु मृत्यु- र्जीवातुकः स्याद्यमकण्टकोपि । अर्द्धप्रहारः शुभदः शुभाङ्क- युक्तोऽन्यथा चेदशुभं विदध्यात् ॥२१॥ , आत्मादयोऽधिपैर्युक्ता धूमादिग्रहसंयुताः । ते भावा नाशतां यान्ति वदतीति पराशरः ॥२२॥ धूमे सन्ततमुष्णं स्यादग्निभीतिर्मनोव्यथा । व्यतीपाते मृगभयं चतुष्पान्मरणं तु वा ॥२३॥ परिवेषे जले भीरुर्जलरोगश्च बन्धनम् । इन्द्रचापे शिलाघातः क्षतं शस्त्रैरपि च्युतिः ॥२४॥ केतौ पतनघाताद्यं कार्यनाशोऽशनेर्भयम् । एते यद्भावसहितास्तद्दशायां फलं वदेत् ॥२५॥ (i) गुलिक के संयोग से सर्वत्र दोष होते हैं । ऊपर बता चुके हैं कि छठे और ग्यारहवें भाव को छोड़कर जिस घर में गुलिक बैठता है उसके शुभ फल को नष्ट करता है—अशुभ फल को बढाता है । (ii) यम कंटक का फल यह है कि जिस ग्रह के साथ यम कष्टक बैठे उस ग्रह के शुभ फल को बढ़ावे-जिस भाव में यम कंटक बैठे उस भाव के शुभ फल में वृद्धि करे ॥१८॥ (iii) दोष युक्त करने में—अशुभ फल बढ़ाने में गुलिक बलवान् होता है । शुभ फल प्रदान करने में यम कंटक बली है । अन्य जो उपग्रह हैं वह दुष्ट फल देने वाले हैं किन्तु जितना दुष्ट फल मान्दि देता है अन्य ग्रह केवल उसका आधा दुष्ट फल देते हैं । मान लीजिये मान्दि