भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पच्चीसवां अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६११ दोषप्रदाने गुलिको बलीयान् शुभंप्रदाने यमकण्टकः स्यात् । अन्ये च सर्वे व्यसनप्रदाने मान्द्युक्तवीर्यार्द्ध बलान्विताः स्युः ॥१९॥ शनिवद्गुलिके प्रोक्तं गुरुवद्यमकण्टके । अर्धप्रहारे बुधवत्फलं काले तु राहुवत् ॥२०॥ मूल ५६ ,, ६० ,, पूर्वाषाढ २४ ,, २८ ,, उत्तराषाढ २० ,, २४ ,, श्रवण १० ,, १४ ,, धनिष्ठा १० ,, १४ ,, शतभिषा १८ ,, २२ ,, पूर्वाभाद्र १६ ,, २० ,, उत्तराभाद्र २४ ,, २८ ,, रेवती ३० ,, ३४ ,, (ख) व्यतीपात तथा वैधृति योग भी त्याज्य है (ग) भद्राकरण त्याज्य है (घ) क्षय तिथि (ङ) वृद्धि तिथि (च) कुलिक, अर्धयाम पातयोग विष्कुंभ और वज्र (छ) (i) परिघयोग का पूर्वार्ध (ii) गंड योग में ६ घड़ी (iii) व्याघात में ९ घड़ी त्याज्य काल यह सब हैं। परन्तु इस प्रकरण में नक्षत्र घटी, के त्याज्य काल लागू करने चाहिये ।