भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पच्चीसवां अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६१५ धूम आदि पांच उपग्रह-धूम, व्यतीपात, परिवेष, इन्द्रचाप, उपकेतु- यह बिना दिखाई देते हुए ही आकाश में संचार करते हैं । अर्थात् जैसे सूर्य, चन्द्र आदि सात ग्रह दिखाई देते हैं उस प्रकार यह पाँच उप- ग्रह दिखाई नहीं देते । यह उपग्रह (धूम आदि) कभी-कभी कहीं-कहीं दिखाई दे जाते हैं । जब यह कहीं दिखाई दें तो समझिये कि लोक में कुछ उपद्रव होगा अर्थात् जिस देश में या प्रदेश में दिखाई दें उसमें कुछ दुर्घटना घटित होगी ॥२७॥ धूमस्तु धूमपटलः पुच्छर्क्षमिति केचन । उल्कापातो व्यतीपातः परिवेषस्तु दृश्यते ॥२८॥ कुछ लोग कहते हैं कि "धूम" धुएं का समूह है किन्तु अन्य लोगों के विचार से यह पूंछ वाला तारा या पुच्छल तारा है । उल्कापात तारे के गिरने की तरह व्यतीपात होता है । परिवेष-सूर्य या चन्द्रमा के चारों ओर गोल मंडल के रूप में दिखाई देता है ॥२८ लोके प्रसिद्धं यद्दृष्टं तदेवेन्द्रधनुः स्मृतम् । केतुश्च धूमकेतुः स्याल्लोकोपद्रवकारकः ॥२९॥ दिन में वर्षा के बाद (जैसे दोपहर में वर्षा समाप्त हो गई तो उसके बाद) आकाश में सात रंग का धनुष जो कभी-कभी दिखाई दे जाता है और जिसे लौकिक भाषा में इन्द्र धनुष कहते हैं-वही "इन्द्र चाप" है । 'केतु' धूम केतु को कहते हैं । यह लोक में उपद्रव- कारक है ॥२९॥ —————— यह केतु—राहु केतु वाले केतु से भिन्न है।