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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पच्चीसवां अध्याय : गुलिकादि उपग्रह ६१५ धूम आदि पांच उपग्रह-धूम, व्यतीपात, परिवेष, इन्द्रचाप, उपकेतु- यह बिना दिखाई देते हुए ही आकाश में संचार करते हैं । अर्थात् जैसे सूर्य, चन्द्र आदि सात ग्रह दिखाई देते हैं उस प्रकार यह पाँच उप- ग्रह दिखाई नहीं देते । यह उपग्रह (धूम आदि) कभी-कभी कहीं-कहीं दिखाई दे जाते हैं । जब यह कहीं दिखाई दें तो समझिये कि लोक में कुछ उपद्रव होगा अर्थात् जिस देश में या प्रदेश में दिखाई दें उसमें कुछ दुर्घटना घटित होगी ॥२७॥ धूमस्तु धूमपटलः पुच्छर्क्षमिति केचन । उल्कापातो व्यतीपातः परिवेषस्तु दृश्यते ॥२८॥ कुछ लोग कहते हैं कि "धूम" धुएं का समूह है किन्तु अन्य लोगों के विचार से यह पूंछ वाला तारा या पुच्छल तारा है । उल्कापात तारे के गिरने की तरह व्यतीपात होता है । परिवेष-सूर्य या चन्द्रमा के चारों ओर गोल मंडल के रूप में दिखाई देता है ॥२८ लोके प्रसिद्धं यद्दृष्टं तदेवेन्द्रधनुः स्मृतम् । केतुश्च धूमकेतुः स्याल्लोकोपद्रवकारकः ॥२९॥ दिन में वर्षा के बाद (जैसे दोपहर में वर्षा समाप्त हो गई तो उसके बाद) आकाश में सात रंग का धनुष जो कभी-कभी दिखाई दे जाता है और जिसे लौकिक भाषा में इन्द्र धनुष कहते हैं-वही "इन्द्र चाप" है । 'केतु' धूम केतु को कहते हैं । यह लोक में उपद्रव- कारक है ॥२९॥ —————— यह केतु—राहु केतु वाले केतु से भिन्न है।

६१६ फलदीपिका गुलिकभवननाथे केन्द्रगे वा त्रिकोणे बलिनि निजगृहस्थे स्वोच्चमित्रस्थिते वा । रथगजतुरगाणां नायको मारतुल्यो महितपृथुयशास्स्यान्मेदिनीमण्डलेन्द्रः ॥३०॥ जिस घर में गुलिक है-उस घर का स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हो, बली हो, अपने घर या अपनी उच्च राशि या मित्रराशि में हो तो जातक बहुत सुन्दर, यशस्वी और पृथ्वी का स्वामी होता है ॥३०॥

छब्बीसवाँ अध्याय गोचरफल सर्वेषु लग्नेष्वपि सत्सु चन्द्र- लग्नं प्रधानं खलु गोचरेषु । तस्मात्तदृक्षादपि वर्तमान- ग्रहेन्द्रचारैः कथयेत्फलानि ॥१॥ यद्यपि जन्म कुंडली में जन्म लग्न से, सूर्य को लग्न मानकर (अर्थात् सूर्य जिस राशि में हो उसे लग्न मानकर) या अन्यग्रह जिस राशि में हों-उन्हें लग्न मानकर विचार किया जा सकता है किन्तु गोचर फलादेश में चन्द्र लग्न की प्रधानता है । इसलिये-जिस समय का विचार करना हो उस समय चन्द्र राशि से (जिस जातक की कुंडली का विचार करना हो उसके जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि में हो-उसको लग्न मानकर- इसे ही चन्द्र लग्न कहते हैं-उस चन्द्र लग्न से) कौन सा ग्रह कहाँ जा रहा है-वह शुभ फल करेगा या अनिष्ट फल करेगा-इसका विचार करना चाहिये ॥१॥ तेईसवें अध्याय में प्रत्येक ग्रह से तथा जन्म लग्न से गोचर का विचार अष्टक वर्ग द्वारा बतलाया गया है । अष्टक का अर्थ है आठ । लग्न तथा सात ग्रह-सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि इन आठों से विचार करके रेखा या बिन्दु लगाकर यह देखा जाता

६१८ फलदीपिका है कि आठ में से-कितनों से गोचरवश ग्रह अच्छा है-कितने से अनिष्ट है-अधिक से अच्छा और थोड़े ग्रहों से निकृष्ट हुआ तो परिणाम में शुभ, और यदि अधिक ग्रहों से-उनकी जन्मकालीन राशि स्थिति से गिनने पर अशुभ हुआ और थोड़े ग्रहों से शुभ तो परिणाम में अशुभ । चौबीसवें अध्याय में सूर्य राशि (जन्म कुंडली में सूर्य जिस राशि से बैठा है) से नवम राशि से पिता का विचार करना; चन्द्र राशि (जन्म कुंडली में चन्द्रमा जिस राशि में बैठा हो) से चतुर्थ राशि से माता का विचार करना, मंगल राशि (जिस राशि में जन्म कुंडली में मंगल बैठा हो) से तृतीय जो राशि हो उससे भाई का विचार करना. इस प्रकार सूर्य, लग्न, चन्द्र लग्न, मंगल लग्न आदि प्रत्येक ग्रह स्थिति को लग्न मान उससे नवीं, चौथी, तृतीय आदि राशियों से, गोचर विचार बतलाया गया है। अब छब्बीसवें अध्याय में चन्द्र लग्न को प्रधान मान- कर गोचर विचार क्यों बताया गया ? ऐसी शंका होना स्वाभाविक है । इसका कारण यह है कि चन्द्रमा मन है । वेदों में लिखा है “:चन्द्रमा मनसो जातः” चन्द्रमा उस विराट् पुरुष परब्रह्म परमेश्वर के मन से उत्पन्न हुआ । अर्थात् मन का अधिष्ठाता चन्द्रमा है । अंग्रेजी में चन्द्रमा को लूना कहते हैं । लूना से ही लूनैसी शब्द बना है-जिसका अर्थ है पागलपन । मन विक्षिप्त हो जाने से पागलपन होता है । सुख-दुःख का अनुभव मन ही करता है। अन्य ग्रहों का प्रभाव- मनुष्य पर मन के द्वारा ही पड़ता है—इसीलिए वराहमिहिर ने अपने बृहज्जातक अध्याय २ श्लोक १ में लिखा है । मनस्तुहितगुः अर्थात् चन्द्रमा मन है । इसी कारण चन्द्र लग्न को गोचर फलादेश में प्रधान माना गया है । बहुत से जातकों की कुंडली में जन्म लग्न की अपेक्षा यदि चन्द्र लग्न बलवान् हो तो चन्द्र लग्न को ही लग्न मान कर फलादेश किया

छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६१९ जावे तो विशेष ठीक बैठता है । उदाहरण के लिये निम्नलिखित कुंडली देखिये । जन्म लग्न चन्द्र लग्न [जन्म लग्न : लग्न ४ के; २ भाव ५ मं; ७ भाव १० रा; १० भाव १ बृ; ११ भाव २ बु चं सू; १२ भाव ३ शु श] [चन्द्र लग्न : लग्न २ सू बु चं; २ भाव ३ शु श; ३ भाव ४ के; ४ भाव ५ मं; ९ भाव १० रा; १२ भाव १ बृ] चन्द्रमा उच्च राशि में बैठा है ।' शनि की महादशा कर्क लग्न के विचार से सप्तमेश, अष्टमेश महामारक की दशा है किन्तु चन्द्र लग्न वृषभ है--उससे शनि नवम तथा दशम का स्वामी होकर योगकारक हो जाता है । इस कारण राजयोगकारक होने से शुभ फलप्रद होता है । शनि की महादशा में विलायत गये हैं और अच्छा द्रव्य कमाया हैं । यहाँ इस अध्याय में हम जन्म कुंडली का विचार नहीं कर रहे हैं—केवल गोचर का विचार किया जा रहा है किन्तु प्रसंगवश यह बताया जा रहा है कि—केवल गोचर विचार में ही नहीं अपितु जन्म कुंडली विचार में भी चन्द्र लग्न की प्रधानता है । वराहमिहिर आदि आचार्यों ने चन्द्र लग्न को जन्म लग्न के तुल्य ही प्रधानता दी है । जन्म लग्न से किस प्रकार विचार करना यह बतलाकर लिख दिया है कि इसी प्रकार चन्द्र लग्न से विचार करना ।

६२० फलदीपिका नवें अध्याय में मेष लग्न, वृष लग्न आदि का फल बतलाकर मंत्रेश्वर ने भी १३वें श्लोक में लिख दिया है कि—जो फल मेष, वृष आदि का बताया गया है—यदि जन्म के समय चन्द्रमा इस राशि में हो तो जो लग्न फल कहा गया है उसे चन्द्र लग्न पर भी लागू करना। उदाहरण के लिये किसी व्यक्ति का सिंह लग्न है और चन्द्रमा मेष में है तो सिंह लग्न का फल है (जो नवम अध्याय में बताया गया है) वह तो लागू होगा ही, उसके अलावा जो ‘मेष’ का फल बताया गया है (अध्याय ९ श्लोक १) वह भी उस जातक पर लागू होगा क्योंकि मेष उसका चन्द्र लग्न है—अर्थात् मेष राशि में उसके जन्म के समय चन्द्रमा था। यह सब विस्तार से यहाँ इसलिये समझाया गया है कि जन्म कुंडली विचार में भी, चन्द्र लग्न को जन्म लग्न के समान ही महत्व दिया जाता है। अंग्रेजी, ज्योतिष में प्रायः जन्म लग्न से गोचर विचार किया जाता है। उदाहरण के लिये जन्म लग्न से द्वादश में पापग्रह गोचर से जा रहा है तो अधिक खर्च, द्रव्य की हानि आदि करावेगा। डाक्टर टकर जो अंग्रेजी ज्योतिष के विद्वान हैं, सूर्य लग्न से अर्थात् जिस मनुष्य की जन्म कुंडली का विचार कर रहे हैं उसकी कुंडली में सूर्य जिस राशि में बैठा है उसे जन्म लग्न बनाकर—उससे गोचर का विचार करते हैं। और उनकी गोचर विचार पद्धति में यह विशेषता है कि वह आकाश स्थित नक्षत्र (२७ नक्षत्रों के अलावा) अन्य बड़े तारागणों से—जन्म का कौन सा ग्रह किससे युति कर रहा था—इत्यादि का भी विचार करते हैं।* अस्तु, इस समय हम भारतीय गोचर पद्धति का विचार कर रहे हैं। ऊपर जो जन्म कुंडली (६१९ पृष्ठ पर दी गई है) उसमें जन्म कुंडली

  • इस विषय में जिज्ञासु पाठक डाक्टर डब्ल्यू० जे० टकर लिखित The "Fixed Stars and Your Horoscope" देखें।

छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६२१ के साथ चन्द्र कुंडली भी दी गई है। इस अध्याय में चन्द्र लग्न से गोचर विचार बताया गया है—इस कारण मान लीजिये गोचर में मीन का शनि जा रहा है तो जन्म लग्न कर्क से मीन नवाँ हुआ किन्तु चन्द्र लग्न वृषभ से मीन ग्यारहवाँ हुआ—तो चन्द्र लग्न से ग्यारहवाँ होने के कारण इस अध्याय में जब गोचर से ग्यारहवाँ शनि कहा जावे तो चन्द्र लग्न से ही गणना समझनी चाहिये—जन्म लग्न से नहीं। बारंवार चन्द्र लग्न से यह नहीं लिखा जावेगा—इसलिये इस ओर विशेष ध्यान दिलाया जाता है। सूर्यः षट्त्रिदशस्थितस्त्रिदशषट्सप्ताद्यगश्चन्द्रमाः जीवस्त्वस्ततपोद्विपंचमगतो वक्रार्कजौ षट्त्रिगौ। सौम्यः षट्स्वचतुर्दशाष्टमगतः सर्वेऽप्युपान्तस्थिताः शुक्रः खास्तरिपून्विहाय शुभदस्तिग्मांशुवद्भोगिनौ ॥२॥ गोचर में, अर्थात् जिस समय का शुभाशुभ (शुभ या अशुभ) विचार करना है। उस समय का पंचांग देखकर यह निर्णय करना कि कौन सा ग्रह किस राशि में है। चन्द्र लग्न से निम्नलिखित स्थानों में ग्रह शुभ होते हैं: सूय ३, ६, १०, ११ चन्द्रमा १, ३, ६, ७, १०, ११ मंगल ३, ६, ११ बुध २, ४, ६, ८, १०, ११ बृहस्पति २, ५, ७, ९, ११ शुक्र १, २, ३, ४, ५, ८, ९, ११, १२ शनि ३, ६, ११ राहु ३, ६, १०, ११ केतु ३, ६, १०, ११

६२२ फलदीपिका उदाहरण के लिये पृष्ठ ६१९ पर जो चन्द्र कुण्डली (वृष राशि में चन्द्रमा है—इसलिये वृष से गणना की गई) दी गई है उसका विचार करना है । कर्क में जब सूर्य होगा तो वृषभ, मिथुन, कर्क इस प्रकार गोचर से सूर्य तृतीय होगा । यह शुभ है । इसी प्रकार सर्वत्र समझना चाहिये । लाभविक्रमखशत्रुषु स्थितः शोभनो निगदितो दिवाकरः । खेचरैः सुततपोजलान्त्यगैः व्यार्किभिर्यदि न विद्ध्यते तदा ॥३॥ ऊपर श्लोक में गोचर से प्रत्येक ग्रह के शुभ स्थान बताये गये हैं। इस नियम का एक प्रतिवाद है अर्थात् इस नियम के ऊपर एक दूसरा नियम और है—जो उस परिस्थिति को बतलाता है जिस हालत में श्लोक २ में लिखा हुआ नियम लागू नहीं होगा । वह यह है । श्लोक ३ से ८ तक यही अपवाद—विशेष नियम बताये गये हैं । सूर्य तृतीय में शुभ होगा किन्तु यदि नवें स्थान में चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, राहु, केतु इन ग्रहों में से कोई ग्रह जा रहा हो तो सूर्य तृतीय में शुभ नहीं होगा । इसे वेध कहते हैं । सूर्य का पुत्र शनि है । चन्द्रमा का पुत्र बुध है । सूर्य तृतीय में जब हो तब नवम में शनि के अलावा कोई ग्रह हो तो सूर्य का वेध होता है । सूर्य का पुत्र शनि है । पिता पुत्र का या पुत्र पिता का वेध नहीं करता है । इसी कारण नवम में जो ग्रह वेध कारक बताये गये हैं उनमें शनि नहीं लिखा है । वेध का विचार हमने अपनी पुस्तक 'सुगम ज्योतिष प्रवेशिका' में लिखा है । उसे देखें । वेध के सम्बन्ध में दो विचार हैं । मान लीजिये कर्क का सूर्य वृषभ से तृतीय है । अब 'नवम' कहाँ से गिनना ? वृष राशि (जहाँ जन्म कुंडली में चन्द्रमा है वहाँ) से नवम गिनना या

छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६२३ गोचर में सूर्य कर्क राशि में है, तो कर्क से नवम गिनना ? दोनों परिपाटी प्रचलित हैं। नारद का मत है कि वृषभ से ही नवम गिनना। इस पुस्तक में यही परिपाटी मानी गई है। वृषभ से नवम मकर हुआ। तो जिस समय सूर्य गोचर से कर्क में है उस समय शनि के अलावा कोई ग्रह मकर में हो तो सूर्य का वेध होने के कारण तृतीय सूर्य का शुभ फल नहीं होगा। बुध सूर्य से २८ अंश से अधिक आगे पीछे नहीं रहता। शुक्र सूर्य से ४८ अंश से अधिक आगे-पीछे नहीं जा सकता। इस कारण जब कर्क में सूर्य होगा तो बुध या शुक्र मकर में हो ही नहीं सकते। परन्तु बताना यह था कि शनि के अलावा अन्य ग्रह सूर्य का वेध करते हैं इसलिये अन्य सब ग्रह लिख दिये गये हैं। अब सूर्य के गोचर स्थान तथा वेध स्थान नीचे दिये जाते हैं। शुभ गोचर स्थान ३, ६, १०, ११ वेध स्थान ९, १२, ४, ५ गोचर में एकादश सूर्य शुभ होता है। जन्म कुंडली में वृषभ में चन्द्रमा है। वृषभ से एकादश मीन राशि होती है। मीन में जब सूर्य गोचर से आवेगा (प्रति वर्ष १३ मार्च से १३ अप्रैल तक सूर्य मीन में होता है) तब शुभ होगा किन्तु यदि वृषभ से पंचम (क्योंकि ऊपर ११ के नीचे ५ लिखा है-इसका अर्थ हुआ कि जब चन्द्र राशि से सूर्य एकादश हो तो वेध स्थान चन्द्र राशि से पंचम होगा) कन्या में शनि के अलावा कोई ग्रह हो तो वेध होने से तृतीय सूर्य का जो शुभ फल गोचर का है वह नहीं होगा। द्यूनजन्मरिपुलाभखत्रिगः चन्द्रमाः शुभफलप्रदः सदा ।

६२४ फलदीपिका स्वात्मजान्त्यमृतिबन्धुधर्मगे विध्यते न विबुधैर्यदि ग्रहैः ॥४॥ चन्द्रमा के शुभ गोचर स्थान १, ३, ६, ७, १०, ११, वेध स्थान ५, ९, १२, २, ४, ८ विक्रमायरिपुगः कुजः शुभः स्यात्तदान्त्यसुतधर्मगैः खगैः । चेन्न विद्ध इनसूनुरप्यसौ किन्तु धर्मघृणिना न विध्यते ॥५॥ मंगल के शुभ गोचर स्थान ३, ६, ११ वेध स्थान १२, ९, ५ ऊपर जो श्लोक ३ से—और आगे के श्लोकों में जो शुभ गोचर स्थान लिखे गये हैं—वहाँ तीसरे का बारहवाँ, छठे का नवाँ, ग्यारहवें का पाँचवाँ. इस प्रकार समझना चाहिये । यदि गोचर में मंगल तृतीय में है तो जन्म राशि से द्वादश कोई ग्रह होगा तभी वेध समझना । गोचर में मंगल तृतीय में हो और जन्म राशि से ९वें या ५वें कोई ग्रह हो तो तृतीय मंगल का कोई वेध नहीं होगा । यदि गोचर में छठे मंगल हो और नवें कोई अन्य ग्रह गोचर से हो (गोचर विचार के समय जन्म कुंडली में नहीं) तो वेध होगा । गोचर से एकादश मंगल हो और गोचर से ५वें (जन्म राशि से ५वें) कोई ग्रह हो तो मंगल का वेध होने के कारण शुभ फल नहीं होगा । जो मंगल के शुभ गोचर स्थान हैं वही शनि के हैं : शनि के शुभ गोचर स्थान ३, ६, ११ वेध स्थान १२, ९, ५

छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६२५ अन्तर केवल यह है कि सूर्य, चन्द्र, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु, यह सब मंगल का वेध करते हैं किन्तु सूर्य शनि का पिता होने के कारण, शनि का वेध नहीं करता। केवल चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु, शनि का वेध करते हैं। स्वाम्बुशत्रुमृतिकायगः शुभो ज्ञस्तदा न खलु विध्यते सदा । स्वात्मजत्रितप आद्यनैधन प्राप्तिगैर्विबुधभिर्यदि ग्रहैः ॥६॥ बुध के शुभ गोचर स्थान २, ४, ६, ८, १०, ११ वेध स्थान ५, ३, ९, १, ८, १२ स्वायधर्मतनयास्तसंस्थितो नाकनायकपुरोहितः शुभः। रिःफरन्ध्रखजलत्रिगैर्यदा विध्यते गगनचारिभिर्न हि ॥७॥ बृहस्पति के शुभ गोचर स्थान २, ५, ७, ९, ११ वेध स्थान १२, ४, ३, १०, ८ आसुताष्टमतपोव्ययायगो विद्ध आस्फुजिदशोभनः स्मृतः। नैधनास्ततनुकर्मधर्मधीलाभवैरिसहजस्थखेचरैः ॥८॥ शुक्र के शुभ गोचर स्थान १, २, ३, ४, ५, ८, ९, ११, १२ वेध स्थान ८, ७, १, १०, ९, ५, ११, ३, ६ जन्मन्यायासदाता क्षपयति विभवान् क्रोधरोगाध्वदाता वित्तभ्रंशं द्वितीये दिशति न सुखदो वञ्चनामाग्रहं च ।

६२६ फलदीपिका स्थानप्राप्तिं तृतीये धननिचयमुदाकल्यकृच्छ्रारिहन्ता रोगान् दत्ते चतुर्थे जनयति च मुहुः स्रग्धराभोगविघ्नम् ॥६॥ वित्तक्षोभं सुतस्थो वितरति बहुशो रोगमोहादिदाता षष्ठेऽर्को हन्ति रोगान् क्षपयति च रिपूञ्छोकमोहान्प्रमार्ष्टि । अध्वानं सप्तमस्थो जठरगुदभयं दैन्यभावं च तस्मै रुक्त्रासावष्टमस्थः कलयति कलहं राजभीतिं च तापम् ॥१०॥ अब सूर्य, जन्म राशि से गिनने पर—गोचर वश प्रत्येक स्थान में क्या-क्या फल उत्पन्न करता है, यह बताते हैं । उदाहरण के लिये जन्म कुंडली में वृष राशि में चन्द्रमा है तो सूर्य जब वृष राशि में होगा तो प्रथम स्थान में हुआ; मिथुन में जब सूर्य हुआ तो द्वितीय सूर्य हुआ, इस प्रकार प्रथम, द्वितीय आदि गिनना चाहिये । सूर्य भिन्न- भिन्न स्थानों में क्या फल करता है यह बताते हैं :—(१) परिश्रम कराता है, धन खर्च होता है जातक क्रोध

छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६२७ अनुभव हो। (८) रोग, भय उत्पन्न करे, मन में ताप (चिन्ता) कलह (लड़ाई, झगड़ा, विवाद), राजा या सरकार, अधिकारी वर्ग से भय, उनकी नाराज़गी का अन्देशा हो। (९) आपत्ति, दीनता, अपने प्रिय लोगों से विरह, जो उद्योग किये जावें उनमें असफलता। (१०) जिस कार्य की सिद्धि के लिये काम कर रहे हों उसमें सफलता—कोई बड़ा कार्य उठाया गया हो तो वह पूरा हो। (११) स्थान प्राप्ति, सम्मान वृद्धि, द्रव्य लाभ, रोग से छुटकारा, आर्थिक शारीरिक स्वास्थ्य। (१२) क्लेश, धन की बर्बादी, ज्वर आदि रोग, दोस्त दुश्मनी करें ॥ ११ ॥ आपद्धैन्यं तपसि विरहं चित्तचेष्टानिरोधं प्राप्नोत्युग्रां दशमगृहगे कर्मसिद्धिं दिनेशे । स्थानं मानं विभवमपि चैकादशे रोगनाशं क्लेशं वित्तक्षयमपि सुहृद्वैरमन्त्ये ज्वरं च ॥११॥ यह क्रम से बारहौं स्थानों में गोचरवश सूर्य का फल कहा गया है। प्रति वर्ष प्रायः निम्नलिखित तारीखों को सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है और प्रत्येक राशि में करीब एक महीना रहता है : सूर्य की राशि प्रवेश की अंग्रेज़ी तारीखें मेष प्रवेश १३ या १४ अप्रैल वृष " १४ या १५ मई मिथुन " १५ जून कर्क " १६ या १७ जुलाई सिंह " १६ या १७ अगस्त

६२८ फलदीपिका कन्या प्रवेश १७ सितम्बर तुला " १७ अक्तूबर वृश्चिक " १५-१६ नवम्बर धनु " १६ दिसम्बर मकर " १३ या १४ जनवरी कुंभ " १२ फरवरी मीन " १४ मार्च ऊपर जो तारीखें बताई गई हैं वह स्थूल (मोटा-मोटी) सूर्य संक्रान्ति (सूर्य जब एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण करता है— जाता है) की अंग्रेज़ी तारीखें हैं। कभी फरवरी के २८ दिन हो जाते हैं कभी २९ । इस कारण एकाध दिन का अन्तर पड़ जाता है— इससे अधिक नहीं । अब प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन की पिछली घटनाओं को विचार में लाकर यह देख सकता है कि उसके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाएँ किस महीने (यहाँ महीना सूर्य प्रवेश राशि का गिनना चाहिये १५ ता० से १५ ता० तक, पहली तारीख से ३० या ३१ तारीख तक नहीं) में अधिक होती हैं । यह प्रत्यक्ष है कि जीवन के सब वर्ष एक से नहीं जाते—और सब महीने प्रति वर्ष एक से नहीं जाते क्योंकि सूर्य गोचर ही तो सब कुछ नहीं है— अन्य ग्रहों का भी गोचर होता है—महादशा, अन्तर्दशा भी अच्छी या ख़राब बदलती रहती है । सूर्य संक्रान्तिवश सूर्य गोचर विचार सूर्य गोचर विचार के सिलसिले में हम एक नई बात पाठकों के सामने रखते हैं । यह मन्त्रेश्वर ने नहीं लिखी है । अन्य स्थानों से ली गई हैं। (१) जिस दिन—जिस समय सूर्य संक्रान्ति हो अर्थात् सूर्य एक

छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६२९ राशि से दूसरी राशि में जावे शुद्ध पंचांग में यह देखिये कि जितने घंटे, मिनट पर (जितने बजे) या जितने घड़ी पल भर सूर्य पिछली राशि छोड़ कर आगे की राशि में प्रवेश कर रहे हैं—उस समय चन्द्रमा, किस नक्षत्र में है। जिस नक्षत्र में चन्द्रमा उस समय हो उस नक्षत्र से पहले वाला नक्षत्र एक कागज़ पर नोट कर लीजिये। उदाहरण के लिये जब सूर्य की संक्रान्ति हो रही है उस समय ज्येष्ठा नक्षत्र है तो ज्येष्ठा से पहला अनुराधा आप कागज़ पर नोट करें। यदि मान लीजिये सूर्य संक्रान्ति के समय चन्द्रमा पुष्य नक्षत्र में है तो पुष्य से पहला 'पुनर्वसु' नक्षत्र कागज़ पर नोट कीजिये। अब इस कागज़ पर नोट किये हुए नक्षत्र से गणना प्रारम्भ कीजिये और जन्म नक्षत्र तक—(जिस नक्षत्र में—जिस व्यक्ति का आप विचार कर रहे हैं—उसका जन्म के समय चन्द्रमा था) गिनिये। उदाहरण के लिये किसी व्यक्ति के जन्म के समय भरणी नक्षत्र था (अर्थात् उसके जन्म के समय चन्द्रमा भरणी नक्षत्र में था) और आपको यह विचार करना है कि इस मास में (सूर्य जिस राशि में एक मास रहेगा) सूर्य गोचर से कैसा फल करेगा तो उस सूर्य संक्रान्ति के समय चन्द्रमा मान लीजिये ज्येष्ठा में था तो आपने ज्येष्ठा से पहला नक्षत्र अनुराधा कागज़ पर नोट किया है तो अनुराधा से भरणी (जन्म नक्षत्र) तक गिनिये। अनुराधा १, ज्येष्ठा २, मूल, ३, पूर्वाषाढ़ ४, उत्तराषाढ़ ५, श्रवण ६, धनिष्ठा ७, शतभिषा ८, पूर्वाभाद्र ९, उत्तराभाद्र १०, रेवती ११, अश्विनी १२, भरणी १३, इस प्रकार १३ संख्या आई। इस संख्या के अनुसार उस मास में (१५ ता० से १५ तक) निम्नलिखित फल होगा। (क) यदि संख्या १, २, ३ इनमें से कोई हो तो—यात्रा, सफ़र या रास्ता चलना पड़े।

६३० फलदीपिका। (ख) यदि संख्या ४, ५, ६, ७, ८, ९, इनमें से कोई हो तो भोग । (ग) यदि संख्या १०, ११, १२ इनमें से कोई हो तो 'व्यथा' अर्थात् कष्ट । (घ) यदि संख्या १३, १४, १५, १६, १७, १८ इनमें से कोई हो तो नवीन वस्त्र की प्राप्ति । (ङ) यदि संख्या १९, २०, २१ इनमें से कोई हो तो "हानि" । (च) यदि संख्या २२, २३, २४, २५, २६, २७ इनमें से कोई हो तो विपुल धन की प्राप्ति । क्रमेण भाग्योदयमर्थहानिं जयं भयं शोकमरोगतां च । सुखान्यनिष्टं गदमिष्टसिद्धिं मोदं व्ययं च प्रददाति चन्द्रः ॥१२॥ चन्द्र जन्मकालीन चन्द्र राशि से जब गोचर से चन्द्रमा विविध राशियों में आता है तो क्रमशः निम्नलिखित फल होते हैं :— (१) भाग्योदय (२) धनहानि (३) जय (४) भय (५) शोक (६) अरोगता (७) सुख (८) अनिष्ट फल (९) रोग (१०) इष्ट- सिद्धि—कार्य में सफलता (११) प्रसन्नता (१२) व्यय । जन्मकालीन चन्द्र राशि में हो तो भाग्योदय । द्वितीय में हो तो धनहानि, तृतीय में जय, जन्मकालीन चन्द्र राशि से चौथी राशि में गोचर से चन्द्र आये तब भय—इसी प्रकार सर्वत्र समझना चाहिये ॥ १२ ॥ अन्तः शोकं स्वजनविरहं रक्तपित्तोष्णरोगं लग्ने वित्ते भयमपि गिरां दोषमर्थक्षयं च ।

छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६३१ धैर्ये भौमो जनयति जयं स्वर्णाभूषांप्रमोदं स्थानभ्रंशं रुजमुदरजां बन्धुदुःखं चतुर्थे ॥१३॥ ज्वरमनुचितचिन्तां पुत्रहेतुव्यथां वा कलयति कलहं स्वैः पञ्चमे भूमिपुत्रः । रिपुकलहनिवृत्तिं रोगशान्तिं च षष्ठे विजयमथ धनाप्तिं सर्वकार्यानुकूल्यम् ॥१४॥ कलत्रकलहाक्षिरुग्जठररोगकृत्सप्तमे ज्वरक्षतजरूक्षितो विगतवित्तमानोऽष्टमे । कुजे नवमसंस्थिते परिभवोऽर्थनाशादिभि- र्विलम्बितगतिर्भवत्यबलदेहधातुक्षयैः ॥१५॥ दुश्चेष्टा वा कर्मविघ्नः श्रमः खे द्रव्यारोग्यक्षेत्रवृद्धिश्च लाभे । भौमः खेटो गोचरे द्वादशस्थो द्रव्यच्छेदस्ताप उष्णमयाद्यैः ॥१६॥ मंगल अब मंगल का गोचर फल बताते हैं। जन्मकालीन चन्द्र राशि से गिनने पर जिस राशि में गोचर से मंगल हो उसके अनुसार निम्नलिखित फल होते हैं। (१) अन्तःशोक—मन का भीतर ही भीतर किसी कारण से शोकाकुल या चिन्तायुक्त होना. अपने कुटुम्बियों से वियोग, रक्त सम्बन्धी रोग या पित्त जनित पीड़ा, ज्वर या अन्य उष्णता पैदा करने वाले रोग ।

६३२ फलदीपिका (२) भय, धनहानि वाक् पारुष्य (कठोर वाणी, झगड़ा)। (३) जय, सफलता, धन प्राप्ति, आनन्द। (४) स्थान भ्रंशता (जगह या नौकरी छूट जाय), रोग, पेट की बीमारी, तथा बन्धुओं के कारण दुःख। (५) ज्वर, बिना कारण चिन्ता, सन्तति कष्ट, उद्वेग, अपने लोगों से कलह। (६) शत्रुओं से कलह की निवृत्ति (उन पर विजय हो जाये या उनसे समझौता हो जाये) रोग शान्ति, विजय, धन प्राप्ति तथा सब कामों में अनुकूलता (सफलता)। (७) अपनी स्त्री से कलह, नेत्र रोग, उदर रोग। (८) ज्वर, चोट या घाव से पीड़ा, धन नाश, मान नाश। (९) दीनता या पराजय, अर्थनाश, शरीर में निर्बलता, विलम्ब से चलना आदि अशक्तता के लक्षण, धातु क्षय, आदि। (१०) कार्य में असफलता या विघ्न, परिश्रम, दुश्चेष्टा (ऐसा कार्य जो नहीं करना चाहिये अथवा जो कार्य किया जाय उससे हानि) (११) द्रव्य लाभ, आरोग्य, जमीन जायदाद में लाभ आदि शुभ फल। (१२) धन नाश उष्णता या ताप से विविध रोग, चिन्ता, उद्वेग आदि॥ १३-१६॥ वित्तक्षयं श्रियमरातिभयं धनाप्तिं भार्यातनूजकलहं विजयं विरोधम् । पुत्रार्थलाभमथ विघ्नमशेषसौख्यं पुष्टिं पराभवभयं प्रकरोति चान्द्रिः ॥१७॥ जन्मकालीन चन्द्र राशि से बुध के गोचर वश बारह राशियों के भ्रमण का फल क्रमशः निम्नलिखित है।

छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६३३ (१) धन हानि (२) धन लाभ (३) शत्रुओं से भय (४) धन प्राप्ति (५) अपने स्त्री पुत्रों से कलह (६) विजय (७) विरोध, झगड़ा (८) पुत्र से खुशी, धन लाभ (९) विघ्न (१०) सब प्रकार से सुख (११) धनवृद्धि लाभ (१२) पराजय- दीनता ॥१७॥ जीवे जन्मनि देशनिर्गमनमप्यर्थच्युतिं शत्रुतां प्राप्नोति द्रविणं कुटुम्बसुखमप्यर्थे स्ववाचां फलम् । दुश्चिक्ये स्थितिनाशमिष्टवियुतिं कार्यान्तरायं रुजं दुःखैर्बन्धुजनोद्भवैश्च हिबुके दैन्यं चतुष्पाद्भयम् ॥१८॥ पुत्रोत्पत्तिमुपैति सज्जनयुतिं राजानुकूल्यं सुते षष्ठे मन्त्रिणि पीडयन्ति रिपवः स्वज्ञातयो व्याधयः । यात्रां शोभनहेतवे वनितया सौख्यं सुताप्तिं स्मरे मार्गक्लेशमरिष्टमष्टमगते नष्टं धनैः कष्टताम् ॥१९॥ भाग्ये जीवे सर्वसौभाग्यसिद्धिः कर्मण्यर्थस्थानपुत्रादिपीडा । लाभे पुत्रस्थानमानादिलाभो रिःफे दुःखं साध्वसं द्रव्यहेतोः ॥२०॥ बृहस्पति गोचर वश बृहस्पति के बारह राशियों के भ्रमण का फल निम्न- लिखित है । जन्मकालीन चन्द्र राशि में जब बृहस्पति हो तो प्रथम

६३४ फलदीपिका

राशि और उसके बाद की राशियों को द्वितीय, तृतीय इस प्रकार गणना करनी चाहिए । (१) देश या अपने स्थान से बाहर जाना, धन का अत्यन्त व्यय या नाश, शत्रुता आदि अनिष्ट फल । (२) धन प्राप्ति, कुटुम्ब सुख, अपनी वाणी का इष्टफल, उसकी बात को लोग ध्यान से सुनें या अपनी वाणी द्वारा धन प्राप्त हो । (३) स्थिति नाश— जगह छूटे या स्थान छूटे या आर्थिक या सामाजिक स्थिति में अंतर आये, अपने इष्ट जनों से वियोग, कार्य में विघ्न, रोग आदि दुष्ट फल (४) बन्धुओं से दुःख दीनता, चौपायों से भय । (५) पुत्र की उत्पत्ति, सन्तान सुख, सज्जनों से समागम, राजा की कृपा आदि शुभ फल । (६) अपने दायादों (चचेरे भाई आदि) तथा शत्रुओं से पीड़ा, रोग आदि अशुभ फल । (७) किसी शुभ कार्य से यात्रा, अपनी स्त्री से सुख, पुत्र प्राप्ति आदि शुभ फल । (८) मार्ग क्लेश—व्यर्थ यात्रा से परिश्रम, अशुभ फल, धन नाश, विविध प्रकार के कष्ट । (९) सर्वसौभाग्य, सिद्धि—भाग्योदय, कार्य में सफलता आदि शुभ फल । (१०) धन कष्ट, स्थान कष्ट (नौकरी या ओहदे में कमी या सम्मान में कोई बट्टा । संतान पीड़ा आदि अशुभ फल । (११) पुत्र लाभ, स्थान लाभ (नयी जगह या ओहदा मिले या अपनी जगह में ही इज्जत बढ़े), सम्मान वृद्धि आदि शुभ फल । (१२) द्रव्य सम्बन्धी दुःख, भय, चिन्ता उद्वेग आदि अशुभ फल ॥ १८-२० ॥ अखिलविषयभोगं वित्तसिद्धिं विभूतिं सुखसुहृदभिवृद्धिं पुत्रलब्धिं विपत्तिम् । दिशति युवतिपीडां सम्पदं वा सुखाप्तिं कलहमभयमर्थप्राप्तिमिन्द्रारिमन्त्री ॥ २१ ॥ शुक्र शुक्र का गोचर फल निम्नलिखित है । (१) सब प्रकार का भोग । (२) धनागम । (३) धन वृद्धि—