भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 619, कुल 684 में से

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६१८ फलदीपिका है कि आठ में से-कितनों से गोचरवश ग्रह अच्छा है-कितने से अनिष्ट है-अधिक से अच्छा और थोड़े ग्रहों से निकृष्ट हुआ तो परिणाम में शुभ, और यदि अधिक ग्रहों से-उनकी जन्मकालीन राशि स्थिति से गिनने पर अशुभ हुआ और थोड़े ग्रहों से शुभ तो परिणाम में अशुभ । चौबीसवें अध्याय में सूर्य राशि (जन्म कुंडली में सूर्य जिस राशि से बैठा है) से नवम राशि से पिता का विचार करना; चन्द्र राशि (जन्म कुंडली में चन्द्रमा जिस राशि में बैठा हो) से चतुर्थ राशि से माता का विचार करना, मंगल राशि (जिस राशि में जन्म कुंडली में मंगल बैठा हो) से तृतीय जो राशि हो उससे भाई का विचार करना. इस प्रकार सूर्य, लग्न, चन्द्र लग्न, मंगल लग्न आदि प्रत्येक ग्रह स्थिति को लग्न मान उससे नवीं, चौथी, तृतीय आदि राशियों से, गोचर विचार बतलाया गया है। अब छब्बीसवें अध्याय में चन्द्र लग्न को प्रधान मान- कर गोचर विचार क्यों बताया गया ? ऐसी शंका होना स्वाभाविक है । इसका कारण यह है कि चन्द्रमा मन है । वेदों में लिखा है “:चन्द्रमा मनसो जातः” चन्द्रमा उस विराट् पुरुष परब्रह्म परमेश्वर के मन से उत्पन्न हुआ । अर्थात् मन का अधिष्ठाता चन्द्रमा है । अंग्रेजी में चन्द्रमा को लूना कहते हैं । लूना से ही लूनैसी शब्द बना है-जिसका अर्थ है पागलपन । मन विक्षिप्त हो जाने से पागलपन होता है । सुख-दुःख का अनुभव मन ही करता है। अन्य ग्रहों का प्रभाव- मनुष्य पर मन के द्वारा ही पड़ता है—इसीलिए वराहमिहिर ने अपने बृहज्जातक अध्याय २ श्लोक १ में लिखा है । मनस्तुहितगुः अर्थात् चन्द्रमा मन है । इसी कारण चन्द्र लग्न को गोचर फलादेश में प्रधान माना गया है । बहुत से जातकों की कुंडली में जन्म लग्न की अपेक्षा यदि चन्द्र लग्न बलवान् हो तो चन्द्र लग्न को ही लग्न मान कर फलादेश किया

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