फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६१९ जावे तो विशेष ठीक बैठता है । उदाहरण के लिये निम्नलिखित कुंडली देखिये । जन्म लग्न चन्द्र लग्न [जन्म लग्न : लग्न ४ के; २ भाव ५ मं; ७ भाव १० रा; १० भाव १ बृ; ११ भाव २ बु चं सू; १२ भाव ३ शु श] [चन्द्र लग्न : लग्न २ सू बु चं; २ भाव ३ शु श; ३ भाव ४ के; ४ भाव ५ मं; ९ भाव १० रा; १२ भाव १ बृ] चन्द्रमा उच्च राशि में बैठा है ।' शनि की महादशा कर्क लग्न के विचार से सप्तमेश, अष्टमेश महामारक की दशा है किन्तु चन्द्र लग्न वृषभ है--उससे शनि नवम तथा दशम का स्वामी होकर योगकारक हो जाता है । इस कारण राजयोगकारक होने से शुभ फलप्रद होता है । शनि की महादशा में विलायत गये हैं और अच्छा द्रव्य कमाया हैं । यहाँ इस अध्याय में हम जन्म कुंडली का विचार नहीं कर रहे हैं—केवल गोचर का विचार किया जा रहा है किन्तु प्रसंगवश यह बताया जा रहा है कि—केवल गोचर विचार में ही नहीं अपितु जन्म कुंडली विचार में भी चन्द्र लग्न की प्रधानता है । वराहमिहिर आदि आचार्यों ने चन्द्र लग्न को जन्म लग्न के तुल्य ही प्रधानता दी है । जन्म लग्न से किस प्रकार विचार करना यह बतलाकर लिख दिया है कि इसी प्रकार चन्द्र लग्न से विचार करना ।