फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२० फलदीपिका नवें अध्याय में मेष लग्न, वृष लग्न आदि का फल बतलाकर मंत्रेश्वर ने भी १३वें श्लोक में लिख दिया है कि—जो फल मेष, वृष आदि का बताया गया है—यदि जन्म के समय चन्द्रमा इस राशि में हो तो जो लग्न फल कहा गया है उसे चन्द्र लग्न पर भी लागू करना। उदाहरण के लिये किसी व्यक्ति का सिंह लग्न है और चन्द्रमा मेष में है तो सिंह लग्न का फल है (जो नवम अध्याय में बताया गया है) वह तो लागू होगा ही, उसके अलावा जो ‘मेष’ का फल बताया गया है (अध्याय ९ श्लोक १) वह भी उस जातक पर लागू होगा क्योंकि मेष उसका चन्द्र लग्न है—अर्थात् मेष राशि में उसके जन्म के समय चन्द्रमा था। यह सब विस्तार से यहाँ इसलिये समझाया गया है कि जन्म कुंडली विचार में भी, चन्द्र लग्न को जन्म लग्न के समान ही महत्व दिया जाता है। अंग्रेजी, ज्योतिष में प्रायः जन्म लग्न से गोचर विचार किया जाता है। उदाहरण के लिये जन्म लग्न से द्वादश में पापग्रह गोचर से जा रहा है तो अधिक खर्च, द्रव्य की हानि आदि करावेगा। डाक्टर टकर जो अंग्रेजी ज्योतिष के विद्वान हैं, सूर्य लग्न से अर्थात् जिस मनुष्य की जन्म कुंडली का विचार कर रहे हैं उसकी कुंडली में सूर्य जिस राशि में बैठा है उसे जन्म लग्न बनाकर—उससे गोचर का विचार करते हैं। और उनकी गोचर विचार पद्धति में यह विशेषता है कि वह आकाश स्थित नक्षत्र (२७ नक्षत्रों के अलावा) अन्य बड़े तारागणों से—जन्म का कौन सा ग्रह किससे युति कर रहा था—इत्यादि का भी विचार करते हैं।* अस्तु, इस समय हम भारतीय गोचर पद्धति का विचार कर रहे हैं। ऊपर जो जन्म कुंडली (६१९ पृष्ठ पर दी गई है) उसमें जन्म कुंडली
- इस विषय में जिज्ञासु पाठक डाक्टर डब्ल्यू० जे० टकर लिखित The "Fixed Stars and Your Horoscope" देखें।