फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६३१ धैर्ये भौमो जनयति जयं स्वर्णाभूषांप्रमोदं स्थानभ्रंशं रुजमुदरजां बन्धुदुःखं चतुर्थे ॥१३॥ ज्वरमनुचितचिन्तां पुत्रहेतुव्यथां वा कलयति कलहं स्वैः पञ्चमे भूमिपुत्रः । रिपुकलहनिवृत्तिं रोगशान्तिं च षष्ठे विजयमथ धनाप्तिं सर्वकार्यानुकूल्यम् ॥१४॥ कलत्रकलहाक्षिरुग्जठररोगकृत्सप्तमे ज्वरक्षतजरूक्षितो विगतवित्तमानोऽष्टमे । कुजे नवमसंस्थिते परिभवोऽर्थनाशादिभि- र्विलम्बितगतिर्भवत्यबलदेहधातुक्षयैः ॥१५॥ दुश्चेष्टा वा कर्मविघ्नः श्रमः खे द्रव्यारोग्यक्षेत्रवृद्धिश्च लाभे । भौमः खेटो गोचरे द्वादशस्थो द्रव्यच्छेदस्ताप उष्णमयाद्यैः ॥१६॥ मंगल अब मंगल का गोचर फल बताते हैं। जन्मकालीन चन्द्र राशि से गिनने पर जिस राशि में गोचर से मंगल हो उसके अनुसार निम्नलिखित फल होते हैं। (१) अन्तःशोक—मन का भीतर ही भीतर किसी कारण से शोकाकुल या चिन्तायुक्त होना. अपने कुटुम्बियों से वियोग, रक्त सम्बन्धी रोग या पित्त जनित पीड़ा, ज्वर या अन्य उष्णता पैदा करने वाले रोग ।