भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

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६३२ फलदीपिका (२) भय, धनहानि वाक् पारुष्य (कठोर वाणी, झगड़ा)। (३) जय, सफलता, धन प्राप्ति, आनन्द। (४) स्थान भ्रंशता (जगह या नौकरी छूट जाय), रोग, पेट की बीमारी, तथा बन्धुओं के कारण दुःख। (५) ज्वर, बिना कारण चिन्ता, सन्तति कष्ट, उद्वेग, अपने लोगों से कलह। (६) शत्रुओं से कलह की निवृत्ति (उन पर विजय हो जाये या उनसे समझौता हो जाये) रोग शान्ति, विजय, धन प्राप्ति तथा सब कामों में अनुकूलता (सफलता)। (७) अपनी स्त्री से कलह, नेत्र रोग, उदर रोग। (८) ज्वर, चोट या घाव से पीड़ा, धन नाश, मान नाश। (९) दीनता या पराजय, अर्थनाश, शरीर में निर्बलता, विलम्ब से चलना आदि अशक्तता के लक्षण, धातु क्षय, आदि। (१०) कार्य में असफलता या विघ्न, परिश्रम, दुश्चेष्टा (ऐसा कार्य जो नहीं करना चाहिये अथवा जो कार्य किया जाय उससे हानि) (११) द्रव्य लाभ, आरोग्य, जमीन जायदाद में लाभ आदि शुभ फल। (१२) धन नाश उष्णता या ताप से विविध रोग, चिन्ता, उद्वेग आदि॥ १३-१६॥ वित्तक्षयं श्रियमरातिभयं धनाप्तिं भार्यातनूजकलहं विजयं विरोधम् । पुत्रार्थलाभमथ विघ्नमशेषसौख्यं पुष्टिं पराभवभयं प्रकरोति चान्द्रिः ॥१७॥ जन्मकालीन चन्द्र राशि से बुध के गोचर वश बारह राशियों के भ्रमण का फल क्रमशः निम्नलिखित है।