फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय : वर्ग विभाग ६१ नवांश को करीब-करीब बराबर सा महत्त्व देना उचित है । यदि राशि शरीर है तो नवांश दिल है; शरीर कमज़ोर हो, दिल मज़बूत हो तो मनुष्य दीर्घ आयु तक जिन्दा रहता है किन्तु शरीर बलवान् हो और दिल कमजोर हो तो हार्ट फेल होने में देर नहीं लगती । यदि कोई ग्रह जिस राशि में है उसी नवांश में हो तो उसे वर्गोत्तम कहते हैं । उदाहरण के लिये चन्द्रमा के मेष राशि में दो अंश हों तो चन्द्रमा। मेष राशि और मेष ही नवांश में होने के कारण वर्गोत्तम में हुआ । वर्गोत्तम ग्रह ऐसा ही बलवान् समझा जाता है जैसा स्वराशि में । इसके अतिरिक्त ग्रहों की एक संज्ञा और बतायी है वह है बाल, कुमार, युवा, प्रौढ़ और वृद्ध । मेष मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ राशियों में ६° तक बाल, १२° तक कुमार १८° तक युवा २४° तक प्रौढ़ और अन्तिम ६° में ग्रह मृत (मरा हुआ) समझा जाता है । वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन राशियों में उल्टा क्रम है । ६° तक मृत, १२° तक प्रौढ़, १८° तक युवा, २४° तक कुमार, और अन्तिम ६° तक बाल (बच्चा) समझा जाता है। किसी ग्रह के बलाबल का विचार करना हो तो देखिये कि वह ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में है अपनी राशि, मूल त्रिकोण राशि, उच्च राशि या वर्गोत्तम में है क्या ? इसके बाद सप्त वर्ग या दस वर्ग में विचार कीजिये । बहुत-से लोग केवल दस वर्गों में देखते हैं और मित्र गृही है, स्वराशि में है या उच्च राशि में—इन सब बातों के लिये तेरह वर्गों का विचार करते हैं । वर्गान्योजयतु त्रयोदश सुहृत्स्वर्त्तोच्चभेषु क्रमाद्- द्विस्त्रिः पञ्च चतुर्नवाद्रिवसुषट्संख्यासु वर्गैक्यतः । प्राहुश्चोत्तमपारिजात कथितौ सिंहासनं गोपुरं चेत्यैरावतदेवलोकसुरलोकांशान्श्च पारावतम् ॥ ७ ॥ तेरह वर्गों में यह विचार करना चाहिये कि ग्रह अपनी उच्च राशि में है, मित्र राशि में या स्वराशि में । यदि दो वर्गों में स्वराशि, स्ववर्ग