भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 637, कुल 684 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 637

६३६ फलदीपिका लाभ (नयी जगह या नौकरी की प्राप्ति) या रोज़गार, अपनी हुकूमत, बहुत से नौकरों का होना, धन लाभ आदि शुभ फल होते हैं। चौथे शनि अशुभ फलकारक है—धन नाश, स्त्री नाश (या स्त्री से कलह) बन्धुओं से या उनके कारण कष्ट आदि। जन्म राशि से पंचम शनि हो तो धन की कमी हो या घाटा लगे। सन्तान कष्ट; बुद्धिनाश (मन में शांति न रहे, नाना प्रकार की चिन्ताओं तथा उद्वेगों से अशांति रहे)। जन्म राशि से गोचर वश शनि छठे हो तो शुभ फल देता है। सब प्रकार का सुख, शत्रुओं पर विजय आदि—शुभ फल होते हैं। सप्तम शनि पीड़ाकारक होता है—स्त्री कष्ट (स्त्री को रोग या उससे कलह) अनेक प्रकार का भय, व्यर्थ की कष्टप्रद यात्राएँ आदि। जन्मकालीन चन्द्र राशि से गोचरवश शनि अष्टम आवे तो भी पूर्ण अशुभ फल देता है। संतान नाश या कष्ट, पशु, मित्र, धन, आदि के कारण घोर पीड़ा। मित्र नष्ट हो जायें, पशु मर जायें, धन की विशेष हानि हो। मनुष्य को स्वास्थ सम्बन्धी भी चिन्ता उपस्थित होती है। किसी पीड़ाकारक रोग के कारण विशेष शरीर कष्ट हो। जब गोचर से नवें शनि हो तो दरिद्रता कारक होता है। धर्म कार्य में विघ्न उपस्थित होते हैं। पिता के समान किसी श्रेष्ठ व्यक्ति की (गुरु, चाचा, मामा आदि की मृत्यु होती है और कुछ न कुछ दुःख का कारण बना रहता है। जन्म राशि से दशम शनि हो तो सम्मान भंग (इज़्ज़त में बट्टा लगे) कोई विशेष पीड़ा कारक रोग हो और किसी ऐसे व्यापार (कार्य) में प्रवृत्ति हो जिसमें असफलता हो और घाटा लगे या ऐसा दुष्ट कर्म बन आवे जिसके कारण अप्रतिष्ठा हो। एकादश स्थान में (जन्म कालीन चन्द्र राशि से एकादश राशि में) जब शनि भ्रमण करे तो शुभ फलकारक होता है। सब प्रकार के सुख, बहुत प्रकार के वैभव, उत्कृष्ट कीर्ति आदि शुभ फल होते हैं। जब बारहवें शनि हो तो वृथा कार्यों में लगे रहने के कारण व्यर्थ का परिश्रम