भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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पृष्ठ 638

छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६३७ होता है अर्थात् उद्योग सिद्धि या सफलता न मिलने के कारण केवल कष्ट प्राप्ति होती है । शत्रुओं द्वारा धन नाश, स्त्री और पुत्रों को रोग पीड़ा होती है ॥२२, २३॥ देहक्षयं वित्तविनाशसौख्ये दुःखार्थनाशौ सुखनाशमृत्यून् । हानिं च लाभं सुभगं व्ययं च कुर्यात्तमो जन्मगृहात्क्रमेण ॥ २४ ॥ राहु जन्मकालीन चन्द्र राशि से बारह राशियों में राहु का फल निम्न- लिखित है । (१) बीमारी, शारीरक शक्ति का क्षय । (२) धन नाश । (३) सुख । (४) दुःख । (५)धन नाश ।(६) सुख । (७) नाश । (८) मृत्यु तुल्य कष्ट । (९) हानि । (१०) लाभ । (११) सौभाग्य । (१२) व्यय । ॥२४॥ क्षितितनयपतङ्गौ राशिपूर्वत्रिभागे सुरपतिगुरुशुक्रौ राशिमध्यत्रिभागे । तुहिनकिरणमन्दौ राशिपाश्चात्यभागे शशितनयभुजङ्गौ पाकदो सार्वकालम् ॥२५॥ ग्रहों के विशेष प्रभाव का काल सूर्य और मंगल गोचर वश जब किसी राशि में प्रवेश करते हैं तब प्रवेश करते ही अपना प्रभाव दिखाते हैं । एक राशि में ३० अंश होते हैं—राशि के प्रथम तृतीयांश में इनका विशेष ज़ोर रहता है । बृहस्पति और शुक्र राशि के मध्य भाग में अर्थात् दस अंश