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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६३७ होता है अर्थात् उद्योग सिद्धि या सफलता न मिलने के कारण केवल कष्ट प्राप्ति होती है । शत्रुओं द्वारा धन नाश, स्त्री और पुत्रों को रोग पीड़ा होती है ॥२२, २३॥ देहक्षयं वित्तविनाशसौख्ये दुःखार्थनाशौ सुखनाशमृत्यून् । हानिं च लाभं सुभगं व्ययं च कुर्यात्तमो जन्मगृहात्क्रमेण ॥ २४ ॥ राहु जन्मकालीन चन्द्र राशि से बारह राशियों में राहु का फल निम्न- लिखित है । (१) बीमारी, शारीरक शक्ति का क्षय । (२) धन नाश । (३) सुख । (४) दुःख । (५)धन नाश ।(६) सुख । (७) नाश । (८) मृत्यु तुल्य कष्ट । (९) हानि । (१०) लाभ । (११) सौभाग्य । (१२) व्यय । ॥२४॥ क्षितितनयपतङ्गौ राशिपूर्वत्रिभागे सुरपतिगुरुशुक्रौ राशिमध्यत्रिभागे । तुहिनकिरणमन्दौ राशिपाश्चात्यभागे शशितनयभुजङ्गौ पाकदो सार्वकालम् ॥२५॥ ग्रहों के विशेष प्रभाव का काल सूर्य और मंगल गोचर वश जब किसी राशि में प्रवेश करते हैं तब प्रवेश करते ही अपना प्रभाव दिखाते हैं । एक राशि में ३० अंश होते हैं—राशि के प्रथम तृतीयांश में इनका विशेष ज़ोर रहता है । बृहस्पति और शुक्र राशि के मध्य भाग में अर्थात् दस अंश

६३८ फलदीपिका से बीस अंश तक विशेष प्रभाव या फल उत्पन्न करते हैं। चन्द्रमा और शनि राशि के अन्तिम तृतीयांश अर्थात् २० अंश से ३० अंश तक विशेष फल दिखाते हैं। बुध और राहु सारी राशि में अर्थात् एक अंश से तीस अंश तक सर्वत्र एक सा फल दिखाते हैं ॥२५॥ टिप्पणी—मुहूर्त्त चिंतामणि तथा अन्य कई ग्रंथों में शंका उठाई है कि वेध कारक ग्रह की गणना जन्मकालीन चन्द्र राशि से करना या गोचर द्वारा जिस ग्रह का विचार किया जा रहा है उससे करना। विपरीत-वेध का भी विचार किया है। किंतु इस छोटी सी पुस्तक में नारद कश्यप आदि ऋषि प्रणीत विभिन्न आदेशों का परस्पर सामंजस्य करना संभव नहीं है। जो शास्त्रार्थ की जटिलता में विशेष अभिरुचि रखते हों वे संस्कृत की सम्बन्धित पुस्तकों का अवलोकन कर सकते हैं।

छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६३९

अथ मतान्तरेण रव्यादिग्रहाणां जन्मभाद्गोचरफलवेधयोर्ज्ञानाय चक्रम् ।

श्रीसूर्यःचन्द्रःभौमःबुधःबृहस्पतिःशुक्रःशनिःराहुःकेतुः
स्थाननाशः<br>पन्थापुष्टिः<br>अन्नलाभःभयम्पी-<br>डाचबंधनं<br>भयम्अरिष्टादि<br>भयसुख<br>शत्रुनाशसर्वनाश<br>पीडामयहानि<br>कष्टहानि<br>रोगभय
हानिः<br>भयम्धनलाभः<br>सुखम्धननाशः<br>नेत्रातिःधनलाभःधनादि-<br>लाभसुखम्<br>अर्थलाभःशोकः<br>धनहानिःनैस्वं<br>व्ययञ्चवैरं<br>वित्तनाशः
सुखं<br>श्रियाप्तिःद्रव्याप्तिः<br>सुखम्सुखं<br>श्रीप्राप्तिःशत्रुतौ<br>भयम्भय<br>रोगाप्तिसुखम्<br>अर्थलाभःसुखार्थलाभःनैरुज्यं<br>च नृप्रप्तिःसुखलाभ<br>वृद्धि
रोगभयं<br>माननाशःरोगदाना-<br>र्थनाशःकष्टं<br>शत्रुभीतिःधन सुखा-<br>दिप्राप्तिःधनहानि<br>व्ययम्धनागमःपीडाभयं<br>शत्रुवृद्धिःवैरं<br>शोकश्चैवभीति<br>पीड़ा
दैन्यं<br>अर्थनाशःसुखं<br>कार्यनाशःदृग्भयं<br>धननाशःरुक्-<br>शोकश्चलाभः<br>सुखं चलाभः<br>पुत्रलाभःधनपुत्रयो-<br>र्नाशःहानिः<br>शोकश्चशोक<br>अर्थनाश
रिपुनाशः<br>सुखंवित्तलाभःसुखार्थ-<br>लाभःअलाभः<br>स्थितिःरोगः<br>शोकश्चशत्रुवृद्धिः<br>पीडा चसुखं<br>वित्तलाभःसुखं लक्ष्मी<br>प्राप्तिःसुखम्<br>वित्तद्
गमनं<br>धनहानिःद्रव्यप्राप्ति<br>सुखम्कार्यम्<br>धननाशःपीडामय<br>विग्रहःसम्मानं<br>सुखं चशोकः<br>अतिभयम्दोषः<br>पीडामयम्हानिः<br>कलहःदुर्गति<br>पीड़ाच

६४० फलदीपिका

श्रीसूर्यःचन्द्रःभौमःबुधःबृहस्पतिःशुक्रःशनिःराहुःकेतुः
रोगाप्तिः भयम्क्लेशभयं मृत्युःभयं पाप बुद्धिःधनावाप्ति हानिःमृत्युभय पीड़ा चविपत्तिः धनक्षयःपीड़ाभयम् शत्रुवृद्धिःरुग्भयं सुखं चपीड़ाभयं हानिश्च
कान्तिक्षयः पापबुद्धिःमानं नृपभयम्रुग्भयम्रुग्भयं धननाशःसुखं सम्मानम्सुखं लाभःपापः धननाशःपापकर्म रतिःपापं दैन्यञ्च
१०सौख्यं कर्मसिद्धिःशुभं सुखम्सुखं शोकश्चसुखं सुभोगःअति-दैन्यम्धर्मनाशः असुखम्वैमनस्यम्वैरं सुखम्भयं शोकश्च
११वित्ताप्तिः सुखम्विविधार्थ लाभःलाभः सुखाप्तिःशुभम-र्थागमःसौख्यं धनप्राप्तिःदुःखं धनागमःसुखवित्त-लाभःसुखं वित्तप्राप्तिसुयशो-ऽर्थलाभः
१२द्रव्यनाशः पीड़ाभयंरोगो धननाशःरोगश्शो-कश्चशोकः धननाशःदेहपीडा भयधनागमःक्लेश अनर्थश्चहानिः पीड़ा चपीड़ा वैरञ्च
शु.३।११ ६।१०।७।६।१०। १।३।११।३।६। ११२।४। ६।८। १०।११५।२।९ ।७।१११।२।३ ४।५।८ ९।१२।११६।११ ।३।३।११ ६३।६ ११
वे.९।५। १२।४। शनिवर्जितः२।१२।४ ५।९।८ बुधवर्जितः१२।९ ।५।५।३।९। ४।८।१२ चंद्रवर्जितः४।१२ १०।३ ८।८।७।१ १०।१२।५ ११।६।३९।५। १२ रविवर्जितः१२।५ ९ ।१२।९ ।५।

छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६४१ गोचरफलचक्रम्

सूर्यचन्द्रःभौमःबुधःगुरुःशुक्रःश.रा.के.ग्रहाः
३।६। १०।११॥१।२।३।५।६। ७।९।१०।११३।६ १०।११२।६ १०।११२।५।७ १२।१११।२।३ १२।११३।६।१० ।११।उत्तम
१।२।५ ७।९+ +१।२।५ ७।९१।३।५ ७।९१।३।६ ११।१०॥५।६। ७।१०१।२।५ ।७।९।अरिष्टकारक
४।८।१२४।८।१२४।८।१२४।८।१२४।८।१२४।८।१२४।८।१२विशेष अनिष्ट
प्रायः गोचर वश जो फल ऊपर दिये गये हैं वही वराहमिहिर आदि अन्य आचार्यों ने दिये हैं।
इस कारण पिष्टपेषण नहीं किया जाता है। विद्वानों ने गोचर-विचार का एक चक्र प्रस्तुत किया है, वह
साथ में दिया गया है। इस प्रसंग में ही मंत्रेश्वर ने नक्षत्र-गोचर का भी विचार किया है और कब ग्रह
गोचर द्वारा फल कम करते हैं—कब अधिक इसका विचार भी किया है। वह आगे दिया जाता है :

६४२ फलदीपिका नक्षत्र गोचर सात रेखायें आडी खींचिये और सात रेखायें इन आड़ी रेखाओं को काटती हुई खड़ी खींचिए । अब पूर्वोत्तर दिशा से प्रारम्भ कर जैसा चित्र में दिखाया गया है, क्रमशः कृत्तिका आदि अट्ठाइस (अभिजित् सहित) नक्षत्रों के नाम लिखिए। उत्तर धनिष्ठा शतभिषा पू०भा उ०भा० रेवती अश्विनी भा मी श्रवण कृत्तिका अभिजित् रोहिणी उ०षा मृगशीर पू०षा० आर्द्र : मूल पुनर्वसु ज्येष्ठा पुष्य अनुराधा आश्लेषा विशाखा स्वाती चित्रा हस्त उ०फा पू०फा मघा दक्षिण

छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६४३ रेखाः सप्तसमालिखेदुपरीगास्तिर्यक्तथैव क्रमा- द्दीशादग्निभमादितोऽपि गणयेदादित्यभस्यावधि । वेधा जन्मदिने मृतिर्भयमथाधानाख्यनक्षत्रे कर्मण्यर्थविनाशनं खलु रविर्दद्यात्सपापो मृतिम् ॥२६॥ सूर्य जिस नक्षत्र में गोचर से हो उसका यदि जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से वेध होता हो तो प्राण भय होता है । यदि आधान नक्षत्र (जन्म नक्षत्र से उन्नीसवाँ नक्षत्र) का वेध होता हो तो भय और चिंता होगी । यदि कर्म नक्षत्र (जन्म नक्षत्र से दसवां नक्षत्र) का वेध होता हो तो धन नाश होगा । यदि सूर्य के साथ-साथ कोई क्रूर ग्रह भी हो तो विशेष अनिष्ट परिणाम होता है । एवं विद्धे खचरैः क्रूरैरन्यैर्मरणम् । सौम्यैर्विद्धे न मृतिर्विद्यादेवं सकलम् ॥२७॥ ऊपर जो तीन नक्षत्र बताये गये हैं,उनका यदि अन्य क्रूर ग्रहों से वेध हो रहा हो तो मृत्यु होती है । यदि शुभ ग्रहों से भी वेध हो तो मृत्यु नहीं होती, इसी प्रकार जैसे सूर्य का नक्षत्र गोचर ऊपर बताया गया है, अन्य ग्रहों के नक्षत्र गोचर का भी विचार करना चाहिए ॥२७॥ आधानकर्मर्क्षविपन्निजर्क्षे वैनाशिके प्रत्यरभे वधाख्ये । पापग्रहो मृत्युभयं विदध्या द्वेधेतथा कार्यहरः शुभाख्ये ॥२८॥ जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से (क) उन्नीसवाँ नक्षत्र आधान नक्षत्र कहलाता है, (ख) दसवाँ नक्षत्र कर्म नक्षत्र । (ग) तीसरा नक्षत्र

६४४ फलदीपिका विपत् । (घ) बाईसवां नक्षत्र वैनाशिक । (ङ) पाँचवां नक्षत्र प्रत्यरि, (च) और सातवां नक्षत्र वध कहलाता है । ऊपर लिखे हुए छः नक्षत्र तथा जन्म नक्षत्र इन सातों का यदि पाप ग्रहों द्वारा वेध होता हो तो मृत्यु का भय होता है । यदि साथ ही शुभ ग्रहों से भी वेधू हो तो केवल कार्य हानि (भाग्य हानि, घाटा) आदि अशुभ फल होकर रह जाते हैं ।।२८।। आदित्यसङ्क्रान्तिदिने ग्रहाणां प्रवेशने वा ग्रहणे च युद्धे । उल्कानिपाते च तथाऽद्भुते च जन्मत्रयं स्यान्मरणादिदुःखम् ॥२९॥ (१) जिस दिन सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण हो । (२) या अन्य ग्रह का किसी राशि में संक्रमण हो । (३) ग्रहण हो । (४) ग्रह युद्ध हो । (५) उल्का निपात हो । (६) या कोई अद्भुत “आकाशी चमत्कार” हो । उस दिन यदि जन्म नक्षत्र, अनुजन्म (जन्म नक्षत्र से दसवां नक्षत्र) तथा त्रिजन्म (जन्म नक्षत्र से उन्नीसवां) नक्षत्र हो तो मृत्यु आदि दुःखदायक फल होता है ॥२९॥ असत्फलः सौम्यनिरीक्षितो यः शुभप्रदश्चाप्यशुभेक्षितश्च । द्वौ निष्फलौ द्वावपि खेचरेन्द्रौ यः शत्रुुणा स्वेन विलोकितश्च ॥३०॥ तीन परिस्थितियों में ग्रह गोचर द्वारा अपना पूर्ण प्रभाव दिखाने में निष्फल हो जाते हैं : (१) यदि कोई अशुभ फल देने वाला ग्रह

छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६४५ हो और सौम्य ग्रह द्वारा गोचर काल में निरीक्षित हो तो उसकी अशुभता नष्ट हो जाती है। (२) यदि कोई शुभप्रद ग्रह हो और गोचर के समय अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो उसकी शुभता नष्ट हो जाती है। (३) यदि कोई ग्रह अपने शत्रु से दृष्ट हो तो उसकी शक्ति भी कम हो जाती है और शुभ फल देने में असमर्थ हो जाता है ॥३०॥ अनिष्टभावस्थितखेचरेन्द्रः स्वोच्चस्वगेहोपगतो यदि स्यात् । न दोषकृच्चोत्तमभावगश्चेत् पूर्णं फलं यच्छति गोचरेषु ॥ ३१ ॥ यदि कोई ग्रह गोचर द्वारा अनिष्ट भाव में हो किन्तु अपनी स्वराशि या उच्च राशि में हो तो दोष नही करता (अर्थात् हानि नहीं पहुँचाता)। यदि गोचर द्वारा शुभ भाव में हो और स्वराशि या उच्च राशि का भी हो तो पूर्ण शुभ फल करता है ।३१॥ ग्रहेश्वरास्ते शुभगोचरस्था नीचारिमौढ्यं समुपाश्रिताश्चेत् । ते निष्फलाः किन्त्वशुभाङ्कसंस्थाः कष्टं फलं संविदधत्यनल्पम् ॥३२॥ जो ग्रह गोचर में शुभ हों किन्तु नीच राशि, या शत्रु राशि के हों, या सूर्य के अत्यन्त सानिध्य के कारण मूढ़ावस्था को प्राप्त हों तो वह अपना शुभ प्रभाव दिखाने में निष्फल हो जाते हैं। यदि ऐसी अवस्था में (नीच या शत्रु राशि या मूढ़ावस्था) कोई ग्रह अशुभ भाव में हो तो अत्यन्त अशुभ फल दिखाते हैं ॥३२॥

६४६ फलदीपिका द्वादशाष्टमजन्मस्थाः शन्यर्काङ्गारका गुरुः । कुर्वन्ति प्राणसन्देहं स्थानभ्रंशं धनक्षयम् ॥३३॥ जन्मकालीन चन्द्रराशि से प्रथम, अष्टम और द्वादश राशियों में जब सूर्य, मंगल, बृहस्पति और शनि गोचरवश होते हैं तो धनहानि, स्थानभ्रंशता (जगह छूटे, सम्मान में कमी आदि) अत्यन्त अशुभ फल दिखाते हैं। यहाँ तक कि प्राणों में भी सन्देह हो जाता है। ॥ ३३ ॥ चन्द्राष्टमे च धरणीतनयः कलत्रे राहुः शुभे कविररौ च गुरुस्तृतीये । अर्कः सुतेऽर्किरुदये च बुधश्चतुर्थे मानार्थहानिमरणानि वदेद्विशेषात् ॥३४॥ जन्मकालीन चन्द्रराशि से अष्टम राशि में चन्द्रमा, सप्तम में मंगल, नवम् में राहु, चौथे बुध, तीसरे बृहस्पति, छठे शुक्र, प्रथम में शनि और पंचम में सूर्य गोचर द्वारा अत्यन्त अनिष्ट फल देते हैं ।— धन- हानि, मान-हानि, मृत्यु या मृत्यु तुल्य कष्ट होता है ॥३४॥ अब नक्षत्र गोचर का अन्य प्रकार बतलाते हैं : जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से गिनने पर गोचर द्वारा भिन्न-भिन्न नक्षत्रों में सूर्य के भ्रमण को काल पुरुष के भिन्न-भिन्न अंगों में भ्रमण माना गया है। इसका विवरण निम्नलिखित है । (क) प्रथम नक्षत्र में चेहरे पर । (ख) २, ३, ४ और ५वें नक्षत्र में सिर में, (ग) ६, ७, ८, ९ में छाती। (घ) १०, ११, १२, १३ दाहिनी बाहु ।

छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६४७ वक्त्रे क्ष्मा मूर्ध्नि चत्वार्यु रसि च चतुरः सव्यहस्ते चतुष्कं पादे षड्वामहस्ते चतुरथ नयने द्वौ च गुह्ये द्वयं च । भानुर्नाशं विभूति विजयमथ धनं निर्धनं देहपीडां लाभं मृत्युं च चक्रे जनयति विविधान् जन्मभाद्देहसंस्थः ॥३५॥ (ङ) १४, १५, १६, १७, १८ तथा १९वें नक्षत्र में दोनों पैर । (च) २०, २१, २२, २३वें नक्षत्र ने बाँयी बाँह में । (छ) २४ तथा २५वें नक्षत्र में दोनों नेत्रों में । (ज) २६ तथा २७वें नक्षत्र में गुह्य अंग में भ्रमण करता है। इनका प्रभाव क्रमशः निम्नलिखित है। (क) नाश, (ख) विभूति, (ग) विजय, (घ) धन, (ङ) निर्धनता, (च) देहपीड़ा, (छ) लाभ और (ज) मृत्यु ॥ ३५ ॥ शीतांशोर्वदने द्वयोरतिभयं क्षेमं शिरस्यम्बुधौ पृष्ठे शत्रुजयं द्वयोर्नयनयोर्नेत्रे धनं जन्मभात् । पञ्चस्वात्मसुखं हृदि त्रिषु करे वामे विरोधं क्रमात् पादौ षट्सु विदेशतां जनयति त्रिष्वर्थलाभं करे ॥३६॥ जिस प्रकार विविध नक्षत्रों में सूर्य के भ्रमण का फल ऊपर बताया गया है । उसी प्रकार चन्द्रमा का २७ नक्षत्र में गोचर फल बताया जाता है । जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से गिनने पर (क) १ और २ में—चेहरे में—इसका फल अत्यन्त भय । (ख) ३, ४, ५ और ६ नक्षत्र में—सिर में—फल क्षेम । (ग) ७ और ८ में—पीठ में—फल शत्रुओं पर जय । (घ) ९ और १० में—दोनों नेत्रों में—धनागम होता है । (ङ) ११, १२, १३, १४, १५—हृदय में—फल आत्मसुख ।

६४८ फलदीपिका। (च) १६, १७, १८ में—बायें हाथ में—झगड़ा। (छ) १९, २०, २१, २२, २३ और २४ में—दोनों पैरों में—यात्रा। (ज) २५, २६, २७वें में—दाहिने हाथ में—इसका फल अर्थ लाभ है ॥३६॥ वक्त्रे द्वे मरणं करोत्यवनिर्जः षट् पादयोर्विग्रहं क्रोडे त्रीणि जयं चतुर्विधनतां वामे करे मस्तके। द्वे लाभं चतुराननेऽधिकभयं क्षेमंकरे दक्षिणे वार्द्धिर्द्वे नयने विदेशगमनं चक्रे स्वजन्मर्क्षतः ॥३७॥ अब मंगल का नक्षत्र पुरुष के किस अंग में कब भ्रमण समझना चाहिए यह बताया जाता है। जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से गिनने पर (क) १ और २ नक्षत्र में—चेहरे में—इसका फल मृत्यु। (ख) ३, ४, ५, ६, ७, ८ में दोनों पैरों में—फल झगड़ा। (ग) ९, १०, ११ में—गोद में—इसका फल जय। (घ) १२, १३, १४, १५—बायें हाथ में—फल निर्धनता। (ङ) १६, १७—सिर में—फल लाभ। (च) १८, १९, २०, २१—चेहरे में—फल अत्यन्त भय। (छ) २२, २३, २४, २५ दाहिने हाथ में—फल क्षेम। (ज) २६, २७ नक्षत्रों में—विदेश गमन ॥३७॥ मूर्ध्नि त्रीणि मुखे त्रयं च करयोः षट् पञ्च कुक्षौ तथा लिङ्गे द्वे द्विचतुष्टयं चरणयोः प्राप्तेऽमरेन्द्रार्चितः। शोकं लाभमनर्थमर्थनिचयं नाशं प्रतिष्ठां तथा दद्यादात्मदिनात्तथैव भृगुजस्तद्वद्बुधोऽपि क्रमात् ॥३८॥ अब बुध, बृहस्पति और शुक्र का नक्षत्र पुरुष के विविध अंगों में भ्रमण का विवरण और फल बताया जाता है। बुध, बृहस्पति और

छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६४९ शुक्र तीनों का एक ही क्रम और एक ही फल है । इस कारण एक साथ बताया जाता है । जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से गिनने से । .(क) १, २, ३ नक्षत्रों में सिर में—फल-शोक । (ख) ४, ५, ६ नक्षत्र में चेहरे में-फल—लाभ । (ग) ७, ८, ९, १०, ११, १२ नक्षत्रों में-दोनों हाथों में-फल अनर्थ । (घ) १३, १४, १५, १६, १७ में कुक्षि में –फल-धन लाभ । (ङ) १८, १९ चक्षत्र में गुह्य स्थान में –फल-नाश । (च) २०, २१, २२, २३, २४ २५ २६ २७ नक्षत्र में-दोनों पैरों में-फल-प्रतिष्ठा ॥३८॥ ' भूवेदवह्निगुणवेदशराग्निनेत्र- दस्रं च वक्त्रकरपादपदेषु हस्ते । कुक्षौ च मूर्ध्नि नयनद्वयपृष्ठभागे न्यस्य क्रमेण शनिसंयुतभान्निजर्क्षात्॥३९॥ दुःखं च सौख्यं गमनं च नाशं लाभं स्वभोगं सुखसौख्यमृत्यून् । वक्त्रक्रमादाह फलानि मन्द- स्यैवं तमःखेचरयोर्वदन्तु ॥४०॥ अब शनि, राहु और केतु के नक्षत्र पुरुष के विविध अंगों में भ्रमण का फल बताया जाता है। तीनों का फल एक सा है। इस कारण एक साथ बताया जाता है। जन्मकालीन चन्द्र नक्षत्र से गिनने पर शनि, राहु या केतु :

६५० फलदीपिका (क) १ नक्षत्र में हो तो चेहरे में—इसका फल दुःख। (ख) २, ३, ४, ५ नक्षत्र में हो तो दाहिने हाथ में—फल-सौख्य। (ग) ६, ७, ८ नक्षत्र में हो तो दाहिने पैर में—फल-गमन। (घ) ९, १०, ११ नक्षत्र में हो तो बायें टाँग में—फल-नाश। (ङ) १२, १३, १४, १५ नक्षत्र में हो तो बायें हाथ में—फल लाभ। (च) १६, १७, १८, १९, २० नक्षत्र में हो तो कुक्षि में—फल- स्वभोग। (छ) २१, २२, २३ नक्षत्र में-सिर में-फल-सुख। (ज) २४, २५ नक्षत्र में-नेत्रों में-फल-सौख्य। (झ) २६, २७ नक्षत्र में-पीठ में-फल-मृत्यु। अब गोचर का एक नया प्रकार बतलाते हैं ॥३९-४०॥ यत्राष्टवर्गेऽधिकबिन्दवः स्यु- स्तत्र स्थितो गोचरतो ग्रहेन्द्रः । तद्गतफलं प्राह शुभं व्ययारि- रन्ध्रस्थितो वाऽपि शुभं विधत्ते ॥४१॥ नक्षत्र गोचर विस्तारपूर्वक बताने पर भी पुनः अष्टक वर्ग गोचर की ओर ध्यान दिलाते हैं कि यदि किसी राशि में अष्टक वर्ग के अनुसार किसी ग्रह का गोचर शुभ हो तो—ऐसा ग्रह चाहे चन्द्र राशि से छठे, आठवें या बारहवें भी पड़ा हो,—इसका आशय यह है कि छठा, आठवाँ, बारहवाँ, अनिष्ट स्थान है किन्तु अष्टक वर्ग में अधिक शुभ बिन्दु (उत्तर भारत की संस्कृत पुस्तकों में इन्हें रेखा कहते हैं) पड़े हों—तो शुभ फल ही होता है—अशुभ फल नहीं होता।

छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६५१ रवेर्द्वादशनक्षत्रं भूसुतस्य तृतीयकम् । गुरोः षट्‌तारकं चैव शनेरष्टमतारकम् ॥४२॥ एतेषां च पुरोलत्ता पृष्ठलत्ताः प्रकीर्त्तिताः । शुक्रस्य पञ्चमं तारं चन्द्रजस्य तु सप्तमम् ॥४३॥ राहोस्तु नवमं चैव द्वाविंशं भं हिमद्युतेः । ग्रहस्थितर्क्षाद्गणयेल्लत्तायां जन्मभे व्यथा ॥४४॥ रवेः सर्वार्थहानिः स्यात्तमसोर्दुःखमुच्यते । मरणं जीवलत्तायां बन्धुनाशो भयावहः ॥४५॥ शुक्रस्य कलहो भ्रंश अनर्थः शशिजस्य तु । चन्द्रस्य तु महाहानिर्लत्तामात्रफलं भवेत् ॥४६॥ सर्वत्र लत्तासाङ्कर्ये द्विगुणत्रिगुणादिकम् । वदेद्दोषफलं नॄणां ग्रहाल्लत्ताधिकक्रमात् ॥४७॥ जिस समय का गोचर फल विचार करना हो, उस समय (क) सूर्य जिस नक्षत्र में हो उससे १२वाँ नक्षत्र । (ख) मंगल जिस नक्षत्र में हो उससे तृतीय नक्षत्र । (ग) बृहस्पति जिस नक्षत्र में हो उससे छठा नक्षत्र । (घ) शनि जिस नक्षत्र में हो उससे आठवां नक्षत्र । यह सब पुरोलत्ता कहलाती हैं । इनमें आगे की ओर गिनते हैं । जैसे अश्विनी में सूर्य हो तो उत्तरा फाल्गुनी में पुरोलत्ता होती है ।

६५२ फलदीपिका (ङ) शुक्र जिस नक्षत्र में हो उससे उलटा गिनने से पाँचवां नक्षत्र । (च) बुध जिसमें हो उससे उलटा गिनने से सातवां नक्षत्र । (छ) राहु जिसमें हो उससे उलटा गिनने से नवाँ नक्षत्र ।,और (ज) चन्द्रमा जिसमें हो उससे उलटा गिनने से बाईसवां नक्षत्र पृष्ठलत्ता कहलाती हैं । जैसे, उलटा गिनने से अभिप्राय यह है कि अश्विनी में शुक्र हो तो शतभिषा में शुक्र की लत्ता हुई । यदि जन्म नक्षत्र पर लत्ता पड़े तो व्यथा होती है ॥४४॥ यदि सूर्य की लत्ता हो तो सब प्रकार की अर्थ हानि । राहु या केतु की लत्ता हो तो दुःख । बृहस्पति की लत्ता में मरण, बन्धु नाश और भय । शुक्र की लत्ता में कलह । बुध की लत्ता में स्थान हानि- अनर्थ । चन्द्र की लत्ता में महाहानि । यह भिन्न-भिन्न ग्रहों के लत्ता फल बताये गये हैं ॥४५-४६॥ ऊपर जो लत्ता के अशुभ फल बताये गये हैं वह—एक ही ग्रह की लत्ता पड़े तो साधारण अशुभ फल कारक होता है । किंतु यदि दो या अधिक अशुभ ग्रहों की लत्ता एक साथ पड़ें तो अशुभता की बहुत वृद्धि हो जायगी और जितनी अधिक ग्रहों की लत्ता एक साथ जन्म नक्षत्र पर पड़े उतना ही अधिक अशुभ फल कहना चाहिए ॥४७॥ सर्वतोभद्र चक्र विचार अब गोचर देखने का एक नया प्रकार बताया जाता है:- अब नीचे सर्वतोभद्र चक्र दिया जाता है । इस सर्वतोभद्र चक्र में (i) स्वर (ii) नक्षत्र (iii ) नामाक्षर (iv) राशि (v) तिथि तथा (vi) ग्रहों का विन्यास किया गया है। क्रम इस प्रकार है ।

छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६५३ पूर्व । घ ङ छ । ईशान आग्नेय ┌─────┬────┬────┬────┬───────────┬────┬─────┬────┬────┐ │ अ │ कृ │ रो │ मृ │ आ │ पु │ पु │ आ │ आ │ ├─────┼────┼────┼────┼───────────┼────┼─────┼────┼────┤ │ भ │ उ │ अ │ व │ क │ ह │ ङ │ ऊ │ म. │ ├─────┼────┼────┼────┼───────────┼────┼─────┼────┼────┤ │ अ │ ल │ लृ │वृष │ मिथुन │कर्क│ लृ │ म │ पू.│ ├─────┼────┼────┼────┼───────────┼────┼─────┼────┼────┤ │ रे │ च │ मं.│ ओ │सू. नन्दा मं│ ओ │ सि. │ ट │ उ │ ┌────┐

६५४ फलदीपिका (i) स्वर ईशान कोण आग्नेय कोण नैऋत्य कोण तथा वायव्य कोण में अ, आ, इ, ई रखे गये। फिर इसी क्रम से इन कोणों में उ, ऊ, ऋ, ॠ रखे गए। इसके बाद इसी क्रम से चारो कोणों में ऌ, ॡ, ए, ऐ रखे गए। और अन्दर के चारो कोनों (कोणों) में बाकी के चार स्वर ओ, औ, अं, अः रखे गये हैं। इस प्रकार इन १६ स्वरों का विन्यास क्रमपूर्वक है। (ii) नक्षत्र ऊपर प्रथम पंक्ति (लाइन) में कृत्तिका से प्रारंभ कर चारों ओर २८ नक्षत्र (२७ प्रसिद्ध नक्षत्र और एक अभिजित्) लिखे गये हैं। (iii) नक्षत्रों के नीचे अ ब क ह ड म ट प र त न य भ ज ख ग श द च ल यह २० वर्ण लिखे हैं। ऊपर अ, आ, इ, ई इस क्रम में जो "अ" आया है वह स्वर का बोधक है। और अ ब क ह ड इस क्रम में जो अ आया है वह नामाक्षर का बोधक है। पंचांगों में २७ नक्षत्रों के १०८ चरण के आगे १०८ अक्षर लिखे रहते हैं जो पहले दिये गये हैं। जैसे किसी का अश्विनी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हुआ हो तो उसके जन्म नाम का पहला अक्षर 'चू' से शुरू होना चाहिये। प्रायः प्रत्येक नक्षत्र की मात्रा दी गई है-जैसे च, ची, चू, चे, चो, ख ज की केवल दो मात्रा हैं 'ज' और 'जी'। 'ख' की चार मात्रा है—खी खू खे खो (देखिये मकर राशि के नामाक्षरों की सूची।) इसका कारण क्या है ? इसका कारण यह है कि श्रवण के बाद अभिजित् नक्षत्र की भी गणना होती है। जब मेष लग्न पूर्व दिशा में उदित हो तो आकाश में पृथ्वी के ऊपर (दशम भाव में) अभिजित् नक्षत्र होता था। इसी कारण मध्याह्न (ठीक दोपहर के काल को—समय को, अभिजित् काल या अभिजित् मुहूर्त कहते हैं) यदि इस अभिजित् की नामाक्षरों में गणना की जावे तो इसके चारों चरणों के नामाक्षर होंगे जू जे जो ख। इस प्रकार

छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६५५ 'ज' और 'ख' की भी पांच-पांच मात्रा नक्षत्र नामों में आ जावेंगी । अस्तु, अब जो विषय चल रहा है उस पर आइये । कहीं केवल एक ही अक्षर (केवल अ की मात्रा वाला) दिया गया है जैसे घ, ङ, छ, ष, ण, ठ थ, फ, ढ़, थ, त, झ, ञ यह किस सिद्धान्त पर किया गया है यह ज्ञात नहीं। हमारे ऋषि प्रणीत शास्त्रों में बिना सिद्धान्त के कोई नियम नहीं बनाया गया है परन्तु बहुत से विषयों का सिद्धान्त क्या है यह मालूम नहीं पड़ता यथा शुक्र की महादशा के २० वर्ष, सूर्य की महादशा के ६ वर्ष ही क्यों ? अस्तु इस सर्वतोभद्रचक्र में अब कहड आदि २० अक्षर तो भीतर लिखे गये हैं और १२ अक्षर घङछ आदि बाहर लिखे गये हैं। अश्विन्यादि २७ नक्षत्रों के नामाक्षर की जो सूची पहिले दी गई है उसमें कृत्तिका नक्षत्र से प्रारम्भ करने से निम्नलिखित अक्षर आते हैं:- अ, ब, क घ ङ छ ह, ड, म ट प ष ण ठ र, त, न य भ घ फ ढ ज ख ग स द थ झ ञ च ल इनमें से रेखांकित शब्दों को एक साथ रखिये तो अ ब क ह ड म ट पर त न य भ ज ख ग स द च ल यह अक्षरब नते हैं । इन्हीं बीस अक्षरों को सर्वतोभद्र चक्र में अन्दर रक्खा गया है । व में ब भी शामिल समझना चाहिए । अर्थात् यदि 'व' से जिसका नाम शुरू होता है (जैसे विद्याभूषण) उसका भी विचार 'ब' वाले कोष्ठ से ही होगा । श और स दोनों का एक कोष्ठ (खाने) से । (iv) वृष, मिथुन, कर्क इस क्रम से १२ राशियां अन्दर चारों ओर लिखी है । पहिले कृत्तिका नक्षत्र से गणना प्रारम्भ करते थे इस कारण (कृत्तिका का तीन चौथाई भाग वृष राशि में पड़ता है) वृष राशि से प्रारम्भ कर राशियां स्थापित की गई हैं ।

६५६ फलदीपिका (v) इसके अन्दर के दायरे में (खानों या कोष्ठों में) तिथियाँ और वार रखे गये हैं। नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा-यह तिथियों के पांच विभाग हैं। नन्दाः--प्रतिपद् (पड़वा) षष्ठी (छठ) एकादशी भद्राः--द्वितीया (दोज) सप्तमी द्वादशी जयाः--तृतीया (तीज) अष्टमी त्रयोदशी रिक्ताः--चतुर्थी (चौथ) नवमी चतुर्दशी पूर्णाः-पंचमी दशमी पूर्णिमा या अमावास्या (vi) सूर्यवार, चन्द्रवार, मंगलवार आदि सातों वार भी सर्वतो भद्र चक्र में स्थापित हैं। इसे सर्वतोभद्र चक्र क्यों कहते हैं क्योंकि चारों ओर से एक सा होता है। जो मकान चारों ओर से एक सा हो और मकान के चारों ओर पूर्व पश्चिम, उत्तर, दक्षिण में मध्य में-मुख्य द्वार हों उन्हें सर्वतोभद्र आकार का मकान कहते हैं। चारों दिशा में क्रमशः घ ङ छ, ष ण ठ ध फ ढ, थ झ ञ लिखे हैं। आर्द्रा नक्षत्र के नामाक्षर घङछ हैं इस लिये इन अक्षरों को आर्द्रा नक्षत्र के ऊपर लिखा है। देखिये पृष्ठ ६५३। इसी प्रकार हस्त के नीचे ष ण ठ। इसी प्रकार पूर्वाषाढ के नीचे ध फ ढ और उत्तरा भाद्र के बगल में थ झ ञ। स्वस्तिक या सर्वतोभद्र चक्र चारो ओर से एक सा होता है। अब सर्वतोभद्र चक्र से शुभाशुभ विचार कैसे करना यह बताया जाता है। नियम १. (i) शनि, सूर्य केतु, मंगल पाप ग्रह हैं। बाकी के शुभ ग्रह हैं। (ii) यदि क्रूर ग्रहों के साथ बुध हो तो, बुध भी पाप ग्रह समझा जाता है। (iii) क्षीण चन्द्र पाप है।