भारतकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

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छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६५५ 'ज' और 'ख' की भी पांच-पांच मात्रा नक्षत्र नामों में आ जावेंगी । अस्तु, अब जो विषय चल रहा है उस पर आइये । कहीं केवल एक ही अक्षर (केवल अ की मात्रा वाला) दिया गया है जैसे घ, ङ, छ, ष, ण, ठ थ, फ, ढ़, थ, त, झ, ञ यह किस सिद्धान्त पर किया गया है यह ज्ञात नहीं। हमारे ऋषि प्रणीत शास्त्रों में बिना सिद्धान्त के कोई नियम नहीं बनाया गया है परन्तु बहुत से विषयों का सिद्धान्त क्या है यह मालूम नहीं पड़ता यथा शुक्र की महादशा के २० वर्ष, सूर्य की महादशा के ६ वर्ष ही क्यों ? अस्तु इस सर्वतोभद्रचक्र में अब कहड आदि २० अक्षर तो भीतर लिखे गये हैं और १२ अक्षर घङछ आदि बाहर लिखे गये हैं। अश्विन्यादि २७ नक्षत्रों के नामाक्षर की जो सूची पहिले दी गई है उसमें कृत्तिका नक्षत्र से प्रारम्भ करने से निम्नलिखित अक्षर आते हैं:- अ, ब, क घ ङ छ ह, ड, म ट प ष ण ठ र, त, न य भ घ फ ढ ज ख ग स द थ झ ञ च ल इनमें से रेखांकित शब्दों को एक साथ रखिये तो अ ब क ह ड म ट पर त न य भ ज ख ग स द च ल यह अक्षरब नते हैं । इन्हीं बीस अक्षरों को सर्वतोभद्र चक्र में अन्दर रक्खा गया है । व में ब भी शामिल समझना चाहिए । अर्थात् यदि 'व' से जिसका नाम शुरू होता है (जैसे विद्याभूषण) उसका भी विचार 'ब' वाले कोष्ठ से ही होगा । श और स दोनों का एक कोष्ठ (खाने) से । (iv) वृष, मिथुन, कर्क इस क्रम से १२ राशियां अन्दर चारों ओर लिखी है । पहिले कृत्तिका नक्षत्र से गणना प्रारम्भ करते थे इस कारण (कृत्तिका का तीन चौथाई भाग वृष राशि में पड़ता है) वृष राशि से प्रारम्भ कर राशियां स्थापित की गई हैं ।