फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५६ फलदीपिका (v) इसके अन्दर के दायरे में (खानों या कोष्ठों में) तिथियाँ और वार रखे गये हैं। नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा-यह तिथियों के पांच विभाग हैं। नन्दाः--प्रतिपद् (पड़वा) षष्ठी (छठ) एकादशी भद्राः--द्वितीया (दोज) सप्तमी द्वादशी जयाः--तृतीया (तीज) अष्टमी त्रयोदशी रिक्ताः--चतुर्थी (चौथ) नवमी चतुर्दशी पूर्णाः-पंचमी दशमी पूर्णिमा या अमावास्या (vi) सूर्यवार, चन्द्रवार, मंगलवार आदि सातों वार भी सर्वतो भद्र चक्र में स्थापित हैं। इसे सर्वतोभद्र चक्र क्यों कहते हैं क्योंकि चारों ओर से एक सा होता है। जो मकान चारों ओर से एक सा हो और मकान के चारों ओर पूर्व पश्चिम, उत्तर, दक्षिण में मध्य में-मुख्य द्वार हों उन्हें सर्वतोभद्र आकार का मकान कहते हैं। चारों दिशा में क्रमशः घ ङ छ, ष ण ठ ध फ ढ, थ झ ञ लिखे हैं। आर्द्रा नक्षत्र के नामाक्षर घङछ हैं इस लिये इन अक्षरों को आर्द्रा नक्षत्र के ऊपर लिखा है। देखिये पृष्ठ ६५३। इसी प्रकार हस्त के नीचे ष ण ठ। इसी प्रकार पूर्वाषाढ के नीचे ध फ ढ और उत्तरा भाद्र के बगल में थ झ ञ। स्वस्तिक या सर्वतोभद्र चक्र चारो ओर से एक सा होता है। अब सर्वतोभद्र चक्र से शुभाशुभ विचार कैसे करना यह बताया जाता है। नियम १. (i) शनि, सूर्य केतु, मंगल पाप ग्रह हैं। बाकी के शुभ ग्रह हैं। (ii) यदि क्रूर ग्रहों के साथ बुध हो तो, बुध भी पाप ग्रह समझा जाता है। (iii) क्षीण चन्द्र पाप है।