फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५४ फलदीपिका (i) स्वर ईशान कोण आग्नेय कोण नैऋत्य कोण तथा वायव्य कोण में अ, आ, इ, ई रखे गये। फिर इसी क्रम से इन कोणों में उ, ऊ, ऋ, ॠ रखे गए। इसके बाद इसी क्रम से चारो कोणों में ऌ, ॡ, ए, ऐ रखे गए। और अन्दर के चारो कोनों (कोणों) में बाकी के चार स्वर ओ, औ, अं, अः रखे गये हैं। इस प्रकार इन १६ स्वरों का विन्यास क्रमपूर्वक है। (ii) नक्षत्र ऊपर प्रथम पंक्ति (लाइन) में कृत्तिका से प्रारंभ कर चारों ओर २८ नक्षत्र (२७ प्रसिद्ध नक्षत्र और एक अभिजित्) लिखे गये हैं। (iii) नक्षत्रों के नीचे अ ब क ह ड म ट प र त न य भ ज ख ग श द च ल यह २० वर्ण लिखे हैं। ऊपर अ, आ, इ, ई इस क्रम में जो "अ" आया है वह स्वर का बोधक है। और अ ब क ह ड इस क्रम में जो अ आया है वह नामाक्षर का बोधक है। पंचांगों में २७ नक्षत्रों के १०८ चरण के आगे १०८ अक्षर लिखे रहते हैं जो पहले दिये गये हैं। जैसे किसी का अश्विनी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हुआ हो तो उसके जन्म नाम का पहला अक्षर 'चू' से शुरू होना चाहिये। प्रायः प्रत्येक नक्षत्र की मात्रा दी गई है-जैसे च, ची, चू, चे, चो, ख ज की केवल दो मात्रा हैं 'ज' और 'जी'। 'ख' की चार मात्रा है—खी खू खे खो (देखिये मकर राशि के नामाक्षरों की सूची।) इसका कारण क्या है ? इसका कारण यह है कि श्रवण के बाद अभिजित् नक्षत्र की भी गणना होती है। जब मेष लग्न पूर्व दिशा में उदित हो तो आकाश में पृथ्वी के ऊपर (दशम भाव में) अभिजित् नक्षत्र होता था। इसी कारण मध्याह्न (ठीक दोपहर के काल को—समय को, अभिजित् काल या अभिजित् मुहूर्त कहते हैं) यदि इस अभिजित् की नामाक्षरों में गणना की जावे तो इसके चारों चरणों के नामाक्षर होंगे जू जे जो ख। इस प्रकार