फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
६५४ फलदीपिका (i) स्वर ईशान कोण आग्नेय कोण नैऋत्य कोण तथा वायव्य कोण में अ, आ, इ, ई रखे गये। फिर इसी क्रम से इन कोणों में उ, ऊ, ऋ, ॠ रखे गए। इसके बाद इसी क्रम से चारो कोणों में ऌ, ॡ, ए, ऐ रखे गए। और अन्दर के चारो कोनों (कोणों) में बाकी के चार स्वर ओ, औ, अं, अः रखे गये हैं। इस प्रकार इन १६ स्वरों का विन्यास क्रमपूर्वक है। (ii) नक्षत्र ऊपर प्रथम पंक्ति (लाइन) में कृत्तिका से प्रारंभ कर चारों ओर २८ नक्षत्र (२७ प्रसिद्ध नक्षत्र और एक अभिजित्) लिखे गये हैं। (iii) नक्षत्रों के नीचे अ ब क ह ड म ट प र त न य भ ज ख ग श द च ल यह २० वर्ण लिखे हैं। ऊपर अ, आ, इ, ई इस क्रम में जो "अ" आया है वह स्वर का बोधक है। और अ ब क ह ड इस क्रम में जो अ आया है वह नामाक्षर का बोधक है। पंचांगों में २७ नक्षत्रों के १०८ चरण के आगे १०८ अक्षर लिखे रहते हैं जो पहले दिये गये हैं। जैसे किसी का अश्विनी नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म हुआ हो तो उसके जन्म नाम का पहला अक्षर 'चू' से शुरू होना चाहिये। प्रायः प्रत्येक नक्षत्र की मात्रा दी गई है-जैसे च, ची, चू, चे, चो, ख ज की केवल दो मात्रा हैं 'ज' और 'जी'। 'ख' की चार मात्रा है—खी खू खे खो (देखिये मकर राशि के नामाक्षरों की सूची।) इसका कारण क्या है ? इसका कारण यह है कि श्रवण के बाद अभिजित् नक्षत्र की भी गणना होती है। जब मेष लग्न पूर्व दिशा में उदित हो तो आकाश में पृथ्वी के ऊपर (दशम भाव में) अभिजित् नक्षत्र होता था। इसी कारण मध्याह्न (ठीक दोपहर के काल को—समय को, अभिजित् काल या अभिजित् मुहूर्त कहते हैं) यदि इस अभिजित् की नामाक्षरों में गणना की जावे तो इसके चारों चरणों के नामाक्षर होंगे जू जे जो ख। इस प्रकार
छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६५५ 'ज' और 'ख' की भी पांच-पांच मात्रा नक्षत्र नामों में आ जावेंगी । अस्तु, अब जो विषय चल रहा है उस पर आइये । कहीं केवल एक ही अक्षर (केवल अ की मात्रा वाला) दिया गया है जैसे घ, ङ, छ, ष, ण, ठ थ, फ, ढ़, थ, त, झ, ञ यह किस सिद्धान्त पर किया गया है यह ज्ञात नहीं। हमारे ऋषि प्रणीत शास्त्रों में बिना सिद्धान्त के कोई नियम नहीं बनाया गया है परन्तु बहुत से विषयों का सिद्धान्त क्या है यह मालूम नहीं पड़ता यथा शुक्र की महादशा के २० वर्ष, सूर्य की महादशा के ६ वर्ष ही क्यों ? अस्तु इस सर्वतोभद्रचक्र में अब कहड आदि २० अक्षर तो भीतर लिखे गये हैं और १२ अक्षर घङछ आदि बाहर लिखे गये हैं। अश्विन्यादि २७ नक्षत्रों के नामाक्षर की जो सूची पहिले दी गई है उसमें कृत्तिका नक्षत्र से प्रारम्भ करने से निम्नलिखित अक्षर आते हैं:- अ, ब, क घ ङ छ ह, ड, म ट प ष ण ठ र, त, न य भ घ फ ढ ज ख ग स द थ झ ञ च ल इनमें से रेखांकित शब्दों को एक साथ रखिये तो अ ब क ह ड म ट पर त न य भ ज ख ग स द च ल यह अक्षरब नते हैं । इन्हीं बीस अक्षरों को सर्वतोभद्र चक्र में अन्दर रक्खा गया है । व में ब भी शामिल समझना चाहिए । अर्थात् यदि 'व' से जिसका नाम शुरू होता है (जैसे विद्याभूषण) उसका भी विचार 'ब' वाले कोष्ठ से ही होगा । श और स दोनों का एक कोष्ठ (खाने) से । (iv) वृष, मिथुन, कर्क इस क्रम से १२ राशियां अन्दर चारों ओर लिखी है । पहिले कृत्तिका नक्षत्र से गणना प्रारम्भ करते थे इस कारण (कृत्तिका का तीन चौथाई भाग वृष राशि में पड़ता है) वृष राशि से प्रारम्भ कर राशियां स्थापित की गई हैं ।
६५६ फलदीपिका (v) इसके अन्दर के दायरे में (खानों या कोष्ठों में) तिथियाँ और वार रखे गये हैं। नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा-यह तिथियों के पांच विभाग हैं। नन्दाः--प्रतिपद् (पड़वा) षष्ठी (छठ) एकादशी भद्राः--द्वितीया (दोज) सप्तमी द्वादशी जयाः--तृतीया (तीज) अष्टमी त्रयोदशी रिक्ताः--चतुर्थी (चौथ) नवमी चतुर्दशी पूर्णाः-पंचमी दशमी पूर्णिमा या अमावास्या (vi) सूर्यवार, चन्द्रवार, मंगलवार आदि सातों वार भी सर्वतो भद्र चक्र में स्थापित हैं। इसे सर्वतोभद्र चक्र क्यों कहते हैं क्योंकि चारों ओर से एक सा होता है। जो मकान चारों ओर से एक सा हो और मकान के चारों ओर पूर्व पश्चिम, उत्तर, दक्षिण में मध्य में-मुख्य द्वार हों उन्हें सर्वतोभद्र आकार का मकान कहते हैं। चारों दिशा में क्रमशः घ ङ छ, ष ण ठ ध फ ढ, थ झ ञ लिखे हैं। आर्द्रा नक्षत्र के नामाक्षर घङछ हैं इस लिये इन अक्षरों को आर्द्रा नक्षत्र के ऊपर लिखा है। देखिये पृष्ठ ६५३। इसी प्रकार हस्त के नीचे ष ण ठ। इसी प्रकार पूर्वाषाढ के नीचे ध फ ढ और उत्तरा भाद्र के बगल में थ झ ञ। स्वस्तिक या सर्वतोभद्र चक्र चारो ओर से एक सा होता है। अब सर्वतोभद्र चक्र से शुभाशुभ विचार कैसे करना यह बताया जाता है। नियम १. (i) शनि, सूर्य केतु, मंगल पाप ग्रह हैं। बाकी के शुभ ग्रह हैं। (ii) यदि क्रूर ग्रहों के साथ बुध हो तो, बुध भी पाप ग्रह समझा जाता है। (iii) क्षीण चन्द्र पाप है।
छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६५७ २. गोचरवश पहले यह निश्चय कीजिये कि किस ग्रह का शुभा- शुभ आपको विचार करना है । मान लीजिये शनि का गोचर विचार करना है। अब गोचर के समय (अर्थात् जिस समय का विचार करता है । उस समय) शनि किस नक्षत्र में है यह देखिये । किसी भी नक्षत्र में ग्रह हो वह तीन प्रकार से वेध करता है : (i) वाम दृष्टि से । (ii) दक्षिण दृष्टि से (iii) सम्मुख दृष्टि से (i) जब ग्रह वक्र होता है तब उसकी दक्षिण दृष्टि होती है । (ii) जब ग्रह 'शीघ्र' हो तो--अपनी स्वाभाविक गति (चाल) से जल्दी चल रहा हो तो--वाम दृष्टि होती है । (iii) जब साधारण चाल से या मध्य गति से चल रहे हों तो सम्मुख दृष्टि होती है । ३. (i) किसी नक्षत्र में स्थिति ग्रह—वाम दृष्टि से वेध करता है तो नक्षत्र, स्वर, वर्ण (अक्षर) आदि का वेध करता है । (ii) इसी प्रकार किसी नक्षत्र में स्थित ग्रह दक्षिण दृष्टि से नक्षत्र, स्वर, वर्ण (अक्षर) आदि का वेध करता है । (iii) किन्तु सम्मुख दृष्टि से नक्षत्र का वेध करता है । स्वर, वर्ण आदि का नहीं करता । ४. (i) उदाहरण के लिए मान लीजिये शनि रोहिणी में है तो ब (अक्षर), मिथुन राशि, औ (स्वर), कन्या (राशि) र (अक्षर) स्वाति (नक्षत्र) को वेध करता है । (ii) 'उ' स्वर, तथा अश्विनी (नक्षत्र) को वेध करता है । (iii) यदि मध्य गति (साधारण चाल) हुई तो सम्मुख दृष्टि से केवल अभिजित् (नक्षत्र) का वेध करेगा ।
६५८ फलदीपिका दूसरा उदाहरण लीजिये : यदि ग्रह (जिसका गोचर से विचार करना है) कृत्तिका नक्षत्र में है तो (i) दृष्टि से अ (अक्षर) वृष राशि, नन्दा तिथि (पड़वा, छठ, एकादशी) सूर्य और मंगल ग्रहों को, भद्रा (दोज, सप्तमी तथा द्वादशी) तिथियों को, तुला राशि, 'त' अक्षर, विशाखा नक्षत्र को वेध करता है। (ii) दृष्टि से भरणी नक्षत्र का वेध करता है । (iii) सम्मुख दृष्टि से श्रवण नक्षत्र का वेध करता है । ५. (i) सूर्य और चन्द्र की सदैव वाम दृष्टि होती है । (ii) राहु और केतु की सदैव दक्षिण दृष्टि होती है । (iii) बाकी पाँच ग्रहों की—मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, की सम्मुख, वाम, दक्षिण-भिन्न-भिन्न समय--इन तीनों दृष्टियों में से एक दृष्टि होती है। जैसा ऊपर नियम २ में बताया गया है। कुछ विद्वानों का मत है कि सूर्य, चन्द्र, राहु और केतु, इनकी सदैव तीनों प्रकार की दृष्टि होती है—वाम, दक्षिण और सम्मुख, परन्तु हमारे विचार से सूर्य चन्द्र की सदैव वाम और राहु केतु की सदैव दक्षिण दृष्टि होती है । ६. (i) जब क्रूर ग्रह वक्री होते हैं तो वह महाक्रूर फल दिखाते हैं । (ii) जब शुभ ग्रह वक्री होते हैं तो अत्यन्त शुभ फल दिखाते हैं। (iii) यदि शुभ ग्रह वक्री हों तो राज्य प्रदान सदृश अत्यन्त शुभ फल करते हैं (iv) यदि पाप ग्रह वक्री हों तो, जातक (जिसकी जन्म कुण्डली का विचार करना हो) को अनेक कष्टों में डालते हैं और वह व्यर्थ में मारा-मारा फिरता है— परिश्रम भी होता है—सफलता भी हाथ नहीं आती ।
छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६५९ ७. (i) जब 'क' अक्षर का वेध हो तब 'घ, ङ छ' का भी वेध होता है। (ii) जब 'प' अक्षर का वेध हो तो 'ष, ण ठ' इन अक्षरों का भी वेध होता है। (iii) जब 'भ' (अक्षर) का वेध हो तब 'ध, फ, ढ' इन वर्णों (अक्षरों) का भी वेध होता है। (iv) जब 'द' (अक्षर) का वेध हो तो 'थ, झ, ञ' इनका भी वेध समझना। ८. (i) 'व' का वेध हो तो 'ब' का 'ब' का वेध हो तो व का भी वेध समझना चाहिये। (ii) 'स' का वेध ही तो 'श' का 'श' का हो तो 'स' भी समझना (iii) 'ख' का वेध हो तो ष का, ष का हो तो ख का भी वेध होता है (iv) 'य' का वेध हो तो ज का 'ज' का हो तो 'य' का भी समझना (v) 'न' का वेध हो तो ण का, 'ण' का हो तो 'न' का भी होता है। ९. (i) अ, आ इन दोनों स्वरों में एक का वेध हो तो दूसरे का भी होता है (ii) इ, ई " " " (iii) उ, ऊ " " " (iv) ऋ, ॠ " " " (v) ऌ, ॡ " " " (vi) ए, ऐ " " "
६६० फलदीपिका (vii) ओ, औ इन दोनों स्वरों में एक का बोध हो तो दूसरे का भी होता है (viii) अ का वेध हो तो अं, अः का भी वेध होता है । १०. (i) जब कोई ग्रह भरणी नक्षत्र के चतुर्थ चरण में या कृत्तिका के प्रथम चरण में हो तो, अ, उ, लृ, ओ इन स्वरों का वेध करता है । (ii) जब कोई ग्रह आश्लेषा के अन्तिम चरण में या मघा के प्रथम चरण में हो तो आ, ऊ, लॄ, औ इन स्वरों का वेध करता है । (iii) जब कोई ग्रह विशाखा के चतुर्थ चरण या अनुराधा के प्रथम चरण में हो तो 'इ, ऋ, ए, अं--इन स्वरों का वेध करता है । (iv) जब कोई ग्रह श्रवण के अन्तिम चरण में हो तो ई, ॠ, ऐ तथा अः--इन स्वरों का वेध करता है । (v) ऊपर की चारों स्थितियों में कोई सी हालत हो--पूर्णा तिथि (पंचमी, दशमी, पूर्णिमा, अमावस्या) इनका वेध होता है । ११. अब जिस व्यक्ति का शुभाशुभ सर्वतोभद्र से विचार करना है उसका (i) नाम का (प्रसिद्ध नाम का) प्रथम अक्षर (ii) स्वर (iii) जन्म नक्षत्र (iv) जन्म तिथि तथा (v) जन्म राशि एक काग़ज़ पर नोट कीजिये । ऊपर जो जन्म के नाम का प्रथम अक्षर, जन्म नक्षत्र, जन्म की तिथि तथा जन्म राशि को नोट करना बताया गया है, सो इन चारों से तो पाठक अच्छी तरह परिचित हैं--इस कारण इनको समझाने की आवश्यकता नहीं । किन्तु "स्वर' को समझाने की आवश्यकता है ।
छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६६१ वर्ण स्वर मालूम करने का निम्नलिखित प्रकार है : वर्ण स्वरचक्र | क | छ | ड | ध | भ | व | इनका वर्ण स्वर 'अ' | | ख | ज | ढ | न | म | श | इनका वर्ण स्वर 'इ' | | ग | झ | त | प | य | ष | इनका वर्ण स्वर उ | | घ | ट | थ | फ | र | स | इनका वर्ण स्वर ए | | च | ठ | द | ब | ल | ह | इनका वर्ण स्वर ओ | यद्यपि (i) ब और व, (ii) श और स (iii) प और ख इनका वर्ण स्वर ऊपर के चक्र में अलग-अलग है लेकिन दोनों में से (जैसे ब और व) के एक का वर्ण स्वर विद्ध हो तो दूसरे का भी समझना चाहिये । ‘क’ से ‘ह’ तक ३३ व्यंजन होते हैं। यहाँ चक्र में व्यञ्जन सिर्फ ३० ही दिये गये हैं । ङ, ञ, ण नहीं दिये गये हैं क्योंकि प्रायः इन अक्षरों से कोई नाम शुरू नहीं होता । यदि ङ, ञ, ण, इनका वर्ण स्वर ज्ञात करना हो तो ङ का 'उ', ञ का 'इ', तथा ण का 'अ' वर्ण स्वर होता है । १२. (i) अब वेध का फल बताते हैं। ऊपर जन्म नक्षत्र, जन्म राशि, जन्म तिथि, नाम का प्रथम अक्षर, नाम के प्रथम अक्षर का वर्ण स्वर यह जो पांच बताये गये हैं उनमें (i) यदि एक का क्रूर वेध हो तो उद्वेग (चिन्ता, परेशानी) (ii) दो का क्रूर वेध हो तो भय (iii) तीन
६६२ फलदीपिका का क्रूर वेध हो तो हानि (घाटा, नुकसान) (iv) चार का क्रूर वेध हो तो रोग (बीमारी) (v) पांचों का क्रूर वेध हो तो मृत्यु । यदि जन्म राशि—शनि, मंगल, राहु, केतु, सूर्य इन पांचों से वेध में आवे तो भी मृत्यु या मृत्यु सदृश कष्ट होता है । (ii) जैसे पाप ग्रहों से वेध का ऊपर कष्ट फल बताया गया है उसी प्रकार शुभ ग्रहों के वेध से शुभ फल होता है । जितने अधिक (जन्म नक्षत्र, जन्म राशि आदि का) का जितने अधिक शुभ ग्रह (बृहस्पति आदि) से वेध होगा उतना ही अधिक शुभ फल होगा । (iii) पाप ग्रह और शुभ ग्रह दोनों वेध करते हों तो तार- तम्य करके फल कहना चाहिये । पापग्रह का वेध १३. (i) साधारणतः जन्म नक्षत्र का वेध होने से भ्रम (इधर उधर भटकना या मन के विचारों में ऊल जलूल व्यव- स्था होना) नामक्षर के वेध से हानि, स्वर वेध होने से हानि, तिथि वेध होने से भय और जन्म राशि के वेध होने से महाविघ्न—पांचों का एक साथ वेध हो तो जातक ज़िन्दा नहीं रहता । (ii) अब युद्ध के समय (अर्थात् जिस आदमी का शुभा-शुभ विचार कर रहे हैं वह लड़ाई के मैदान में शस्त्र मेंलड़ रहा हो) तो एक) जन्म नाम, जन्म नक्षत्र आदि) के वेध से भय, दो के वेध से धन-क्षय (यदि मुकदमा लड़ रहा हो)
छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६६३ तीन के वेध से भंग (हाथ पैर टूटना) चार के वेध से मृत्यु । १४. (i) सूर्य के वेध से मनस्ताप (चिन्ता, परेशानी) । (ii) मंगल ,, द्रव्य-हानि (रुपये की हानि) । (iii) शनि ,, रोग और पीड़ा । (iv) राहु या केतु के वेध से विघ्न (रुकावट, अड़चन आपत्ति) (v) चन्द्रमा के वेध से मिला-जुला फल अर्थात् क्षीण चन्द्र के वेध से अनिष्ट फल, बलवान् चन्द्रमा के वेध से शुभ फल । (vi) शुक्र के वेध से—आदमियों की कुण्डलियों में स्त्रियों से सहवास, रति, स्त्रियों की कुंडलियों में रति-दोनों की कुण्डलियों में वस्त्र, आभूषण आदि सुन्दर प्रिय वस्तु प्राप्ति । (vii) बुध का वेध होने से बुद्धि अच्छी हो, नये विचार सूझें, ज्ञान की वृद्धि हो, वार्तालाप में सफलता-ख़ुशी देने वाले पत्र या समाचार आवें । (viii) बृहस्पति के वेध से सब शुभ फल । १५. (i) यदि ग्रह वेध के समय वक्री हो तो दुगुना फल देता है । पाप ग्रह हो तो दुगुना कष्ट । शुभ ग्रह हो तो दुगुना लाभ या प्रसन्नता । (ii) यदि ग्रह वेध के समय अपनी उच्च राशि में हो तो तिगुना फल (iii) सामान्य राशि में हो तो सामान्य फल। (iv) नीच राशि में हो तो आधा फल ।
६६४ फलदीपिका मुहूर्त के समय 'वेध' देखना चाहिये १६. (१) जो तिथि, राशि, नवांश, या नक्षत्र पाप ग्रह से वेध किये जा रहे हों—उनको शुभ कार्य प्रारंभ के समय नहीं लेना। उदाहरण के लिये अष्टमी तिथि का वेध (पाप ग्रह) से हो रहा है तो कोई नवीन कार्य अष्टमी को प्रारंभ न करना। (२) ऐसे समय जो बीमार पड़ता है जल्दी अच्छा नहीं होता। विवाह करता है तो वैवाहिक सुख नहीं होता। यात्रा करता है तो यात्रा सफल नहीं होती। (३) यदि जन्म का वार विद्ध हो (देखिये सर्वतो भद्र चक्र में तिथियों के कोष्ठों में सू. च. मं आदि लिखे हैं—उन से उन-उन ग्रहों के वार समझना) तो उस वार को मन को खुशी नहीं होती, पीड़ा होती है। १७. अस्त दिशा (i) पूर्व की वृष, मिथुन, कर्क राशि है। जब इन तीनों राशियों में से किसी में सूर्य हो तब पूर्व दिशा को अस्त समझना। ईशान कोण में जो स्वर हैं—अर्थात् अ, उ लृ ओ—यह भी अस्त समझना। (ii) दक्षिण की ओर सिंह, कन्या और तुला राशियाँ हैं। जब इन में से किसी राशि में सूर्य हो तो दक्षिण दिशा को अस्त समझना। आ, ऊ लृ और औ—यह जो चार स्वर हैं इनको अस्त मानिये। (iii) पश्चिम दिशा की ओर वृश्चिक, धन, मकर राशियाँ हैं। जब इनमें से किसी में सूर्य हो तो इन दिशाओं
छब्बीसवां अध्याय : गोचरफल ६६५ को तथा नैऋत्य कोण के स्वर-इ, ऋ, ए, अं—इन को अस्त कहा जाता है। (iv) उत्तर दिशा में कुंभ, मीन मेष यह राशियां है तथा वायव्य कोण के चार स्वर, ई, ॠ, ऐ और अः यह उस समय अस्त माने जाते हैं जब कुंभ, मीन मेष इन तीन राशियों में से किसी में सूर्य हो। (v) जो राशियाँ अस्त हों उनकी दिशा के नक्षत्र, स्वर, वर्ण, तिथि सब अस्त समझी जावेंगी। (vi) यदि किसी का नामाक्षर, स्वर, जन्म नक्षत्र, जन्म राशि तिथि सब अस्त हों तो- नक्षत्र के अस्त होने से रोग, वर्ण (नामाक्षर) के अस्त होने से हानि, स्वर के अस्त होने से शोक, राशि के अस्त होने से विघ्न, तिथि के अस्त होने से भय होता है। (vii) अस्त दिशा की ओर यात्रा नहीं करनी चाहिये। उस दिशा में मकान का दरवाजा न बनवाये । (vii) जब नामाक्षर अस्त हो तो कार्य में प्रायः सफलता नहीं मिलती । (viii) जन्म नक्षत्र उदित हो जावे अर्थात् 'अस्त' दोष न रहे तो पुष्टि, वर्ण नामाक्षर उदित हो तो लाभ, स्वर उदित हो तो सुख, जन्म राशि उदित हो तो जय, जन्म तिथि उदित हो तो तेज । पांचों उदित हों तो नवीन पद प्राप्ति । उपग्रहों के विचार स सर्वतोभद्र विचार में तारतम्य सूर्य विचार १८. सूर्य (गोचर के समय) जिस नक्षत्र में हो उस से (i) पाँचवां नक्षत्र 'विद्युन्मुख'
६६६ फलदीपिका (ii) आठवाँ नक्षत्र 'शूल' (iii) चौदहवाँ नक्षत्र 'सन्निपात' (iv) अठारहवाँ नक्षत्र 'केतु' (v) इक्कीसवाँ नक्षत्र 'उल्का' (vi) बाईसवाँ नक्षत्र 'कम्प' (vii) तेइसवाँ नक्षत्र 'वज्रक' तथा (viii) चौबीसवाँ नक्षत्र निर्घात कहलाता है। यदि इन आठों नक्षत्रों में से एक या अधिक नक्षत्र में कोई ग्रह हों तो वे कार्य में बाधा करते हैं। चन्द्र-विचार जन्म के समय जिस नक्षत्र में चन्द्रमा हो वह जन्म नक्षत्र कहलाता है। जन्म नक्षत्र से दसवाँ नक्षत्र 'कर्म', सोलहवाँ नक्षत्र, सांघातिक अठारहवाँ 'सामुदायिक', उन्तीसवाँ नक्षत्र 'आधान', तेईसवाँ विनाशी, छब्बीसवाँ नक्षत्र 'जाति', सत्ताइसवाँ नक्षत्र देश और अट्ठाइसवाँ नक्षत्र 'अभिषेक' कहलाता है। यदि जन्म, कर्म, आधान और विनाश नक्षत्रों में पाप ग्रह गोचर वश हों तो कष्ट कलह दुःख शोक आदि फल होते हैं। सामुदायिक नक्षत्र में पाप ग्रह हो तो कोई अनिष्ट, उत्पात होता है। 'जाति' नक्षत्र का वेध हो तो कुटुम्ब कष्ट, 'अभिषेक' नक्षत्र का पाप ग्रह से वेध हो तो कष्ट (जेल आदि)। 'देश' नक्षत्र में पाप ग्रह हो तो देश- निष्कासन आदि अनिष्ट फल। यदि शुभ ग्रहों से वेध हो तो शुभ फल होता है।
छब्बीसवाँ अध्याय : गोचरफल ६६७ सर्वतो भद्र चक्रोक्त शुभवेधाः शुभावहाः । पापवेधा दुःखतरा गोचरेताश्च चित्तयेत् ॥४८॥ वेधकारक पापग्रह दुःखदायी होते हैं शुभग्रह वेध कारक होने से शुभ फल करते हैं, इस कारण गोचर में सर्वतोभद्र में जो वेध द्वारा शुभ या अशुभ फल बताये गये हैं उनका भी विचार कर लेना चाहिए ॥४८॥ दशापहाराष्टक वर्गगोचरे ग्रहेषु नृणां विषमस्थितेष्वपि । जपेच्च तत्प्रीतिकरैः सुकर्मभिः करोति शान्तिं व्रतदानवन्दनैः ॥४६॥ यदि कोई ग्रह गोचर में अशुभ हो या किसी अनष्टप्रद ग्रह की दशा अन्तर्दशा हो तो उस ग्रह को प्रसन्न करने वाले सुकर्मों द्वारा व्रत, दान, वन्दना, जप, शांति आदि द्वारा उसके अशुभ फल की निवृत्ति करनी चाहिए अहिंसकस्य दान्तस्य धर्मार्जितधनस्य च । सर्वदा नियमस्थस्य सदा सानुग्रहा ग्रहाः ॥५०॥ जो व्यक्ति किसी की हिंसा नहीं चाहता, संयमी होता है (अपने मन और आचरण पर संयम रखता है) तथा धर्म मार्ग से धनोपार्जन करता है और सर्वदा शास्त्रोपदिष्ट नियमों का पालन करता है उस पर ग्रह सदैव अनुग्रह करते हैं।
सत्ताईसवां अध्याय प्रव्रज्या योग ग्रहैश्चतुर्भिः सहिते खनाथे त्रिकोणगैः केन्द्रगतैस्तु मुक्तः । लग्ने गृहान्ते सति सौम्यभागे केन्द्रे गुरौ कोणगते च मुक्तः ॥१॥ यदि दशम भवन का स्वामी चार ग्रहों के साथ केन्द्र या त्रिकोण में हो तो वह जातक "मुक्त" हो जावेगा अर्थात् इस जीवन के बाद उसे मोक्ष प्राप्त होगा । एकर्क्षसंस्थैश्चतुरादिकैस्तु ग्रहैर्वदेत्तत्र बलान्वितेन । प्रव्रज्यकां तत्र वदन्ति केचित् कर्मेशतुल्यां सहिते खनाथे ॥२॥ यदि चार ग्रह एक साथ हों तो उन चारों में जो बली हो उस बली ग्रह से जिस प्रकार की प्रव्रज्या द्योतित हो--वैसी प्रव्रज्या जातक की होती है । यदि उन चारों ग्रहों में दसवें ग्रह का स्वामी हो तो उस दसवें घर के स्वामी के सदृश प्रव्रज्या होती है ऐसा कुछ का मत है ॥२॥
सत्ताईसवां अध्याय : प्रव्रज्या योग ६६९ शशी दृगाणे रविजस्य संस्थितः कुजार्किदृष्टः प्रकरोति तापसम् । कुजांशके वा रविजेन दृष्टो नवांशतुल्यां कथयन्ति तां पुनः ॥३॥ यदि चन्द्रमा शनि के द्रेष्काण में हो और उस पर मंगल और शनि की दृष्टि हो तो जातक तपस्वी होगा । यह एक योग हुआ । अब दूसरा योग बताते हैं। यदि चन्द्रमा मंगल के नवांश में हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो—चन्द्रमा जिस नवांश में है उसके तुल्य प्रव्रज्या होगी ॥३॥ जन्माधिपः सूर्यसुतेन दृष्टः शेषैरदृष्टः पुरुषस्य सूतौ । आत्मीयदीक्षां कुरुते ह्यवश्यं पूर्वोक्तमत्रापि विचारणीयम् ॥४॥ जन्मराशि (जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि में हो) के स्वामी को, जिसकी जन्मकुंडली में केवल शनि देखता हो, अन्य ग्रह न देखते हों वह जातक अपनी दीक्षा अवश्य करता है। जो पहिले कहा गया है (अर्थात् किस प्रकार की प्रव्रज्या होगी) उसका विचार यहाँ भी कर लेना चाहिये ॥४॥ योगीशं दीक्षितं वा कलयति तरणिस्तीर्थपान्थं हिमांशु- र्दुर्मन्त्रज्ञं च बौधाश्रयमवनिसुतो ज्ञो मतान्यप्रविष्टम् ।
६७० फलदीपिका वेदान्तज्ञानिनं वा यतिवरममरेड्यो भृगुर्लिङ्गवृत्तिं व्रात्यं शैलूषवृत्तिं शनिरिह पतितं वाऽथ पाषण्डिनं वा ॥५॥ सूर्य “योगीश” या “दीक्षित” बनाता है। चन्द्रमा तीर्थ पान्थ (तीर्थ यात्रा करने वाला) बनाता है। “दुर्मन्त्र” (दुष्ट मंत्र वाला या कठिन मंत्र साध्य करने वाला) “बुद्ध का आश्रय लेना” (बुद्ध का आश्रय लेने से तात्पर्य है—बौद्ध भिक्षु) मंगल के प्रभाव से होता है। जो अन्य के मत में प्रविष्ट हो—ऐसा बुध के प्रभाव से होता है। बृहस्पति वेदान्त ज्ञानी या यतियों में श्रेष्ठ बनाता है। यदि शुक्र प्रबल हो तो लिंगवृत्ति (अर्थात् बाहर से तो साधु संन्यासियों के लक्षण वाला परन्तु भीतर से पाषण्डी या व्रात्य या नाचने-गाने वाला (नाच, गान, नाटक आदि कर जो संन्यासी धर्म का प्रचार करने वाला हो) और शनि के प्रभाव से पतित या पाखण्डी होता है ॥५॥ अतिशयबलयुक्तः शीतगुः शुक्लपक्षे बलविरहितमेनं प्रेक्षते लग्ननाथः । यदि भवति तपस्वी दुःखितः शोकतप्तो धनजनपरिहीनः कृच्छ्रलब्धान्नपानः ॥६॥ शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा अत्यन्त बलवान् होता है। जब चन्द्रमा निर्बल हो (जन्म कुंडली में) और उसको लग्न का स्वामी देखता हो, ऐसा जातक यदि तपस्वी हो तो वह दुःखित, शोकतप्त, धन और जन से हीन—कठिनता से भोजन और पान (दूध आदि) प्राप्त करेगा। ॥६॥ प्रकथितमुनियोगे राजयोगो यदि स्या- दशुभफलविपाकं सर्वमुन्मूल्य पश्चात् ।
सत्ताईसवां अध्याय : प्रव्रज्या योग ६७१ जनयति पृथिवीशं दीक्षितं साधुशीलं । प्रणतनृपशिरोभिः स्पृष्टपादाम्बजयुग्मम् ॥७॥ पिछले श्लोक में “मुनि” होने का जो योग कहा गया है--वैसी कुंडली में यदि राजयोग भी हो तो जो कुछ अशुभ फल ऊपर श्लोक ६ में बताया है वह दूर हो जाता है और प्रबल राज योग होने से जातक पृथिवी का स्वामी दीक्षित, साधु-शील (साधु के सौशील्यादि गुणयुक्त) राजा होता है, जिसकी अन्य लोग वन्दना करते हैं ॥७॥ चत्वारो द्युचराः खनाथसहिताः केन्द्रे त्रिकोणेऽथवा सुस्थाने बलिनस्त्रयो यदि तदा सन्याससिद्धिर्भवेत् । सद्बाहुल्यवशाच्च तत्र सुशुभस्थानस्थितैस्तैर्वदेत् प्रव्रज्यां महितां सतामभिमतां चेदन्यथा निन्दिताम् ॥८॥ यदि चार ग्रह (जिन चार में एक ग्रह दसवें घर का स्वामी भी हो) केन्द्र या त्रिकोण में हों या तीन ग्रह बली अच्छे
अट्ठाईसवां अध्याय उपसंहाराध्याय संज्ञाध्यायः कारको वर्गसंज्ञो वीर्याध्यायः कर्मजीवोऽथ योगः । योगो राज्ञां राशिशीलो ग्रहाणां मेषादीनां लग्नसम्प्राप्तशीलः ॥१॥ भार्याभावो जातकं कामिनीनां सूनुर्बालारिष्टयोगोऽथ रोगः । भावस्तस्माद्द्वादशावाप्तभावा निर्याणं स्याद् द्विग्रहाद्याश्च तस्मात् ॥२॥ सूर्यादीनां यत्फलं तद्दशाप्तं भावादीनामीश्वराङ्गा दशा च । सूर्यादीनामन्तराख्या दशाऽथ सव्यासव्या कालचक्रोऽष्टवर्गः ॥३॥ होरासारावाप्तयद्यष्टवर्गो मान्द्यध्यायो गोचर स्यात्प्रव्रज्यः । अध्यायानां विंशतिः सप्तयुक्तान् जन्मन्येतद्गोलजं संवदामि ॥४॥ श्रीशालिवाटिजातेन मया मन्त्रेश्वरेण वै । दैवज्ञेन द्विजाग्रेण सतां ज्योतिर्विदां मुदे ॥५॥ सुकुन्तलाम्बां सम्पूज्य सर्वाभीष्टप्रदायिनीम् । तत्कटाक्षविशेषेण कृता या फलदीपिका ॥६॥
अट्ठाईसवां अध्याय : उपसंहार ६७३ मैं शालिवाटि (सम्प्रति टिन्नेवेली) का रहने वाला ब्राह्मणों में श्रेष्ठ ज्योतिषी हूँ। सब अभीष्ट वरों को प्रदान करने वाली भगवती सुकुन्तला माता की आराधना करके, ज्योतिषियों के आनन्द के लिये इस फलदीपिका का मैंने निर्माण किया है । मेरा नाम मन्त्रेश्वर है। इसके पिछले २७ अध्यायों में मैंने निम्नलिखित विषयों का विवेचन किया है। १. संज्ञाध्याय (परिभाषा) । २. ग्रहों का कारकत्व । ३. वर्ग, होरा, द्रेष्काण आदि । ४. ग्रहों का बल और उनकी निर्बलता । ५. किस कर्म से आजीविका प्राप्त होगी । ६. योग । ७. राज योग । ८. भिन्न-भिन्न ग्रहों का भिन्न-भिन्न राशि में होने से प्रभाव । ९. यदि मेष आदि लग्न जन्मकुंडली में हो तो उनका प्रभाव । १०. भार्याभाव । ११. स्त्रियों की जन्मकुंडली में विशेष विचार । १२. सन्तान भाव का विचार । १३. बालारिष्ट (बचपन में बच्चों की मृत्यु) । १४. रोगाध्याय । १५. भावों का फल विवेचन । १६. बारह भावों के फल । १७. निर्याण (मृत्यु) १८. दो या अधिक ग्रहों के योगों का फल । १९. उडुदशा (विंशोत्तरी महादशा)। २०. भावाधीश के कारण ग्रहों का 'फल । २१. अन्तर्दशा तथा प्रत्यन्तर्दशा । २२. कालचक्र दशा आदि । २३. अष्टकवर्ग । २४. अष्टक वर्ग प्रक्रिया जैसी होरा-सार में वर्णित है। २५. मान्दि और अन्य उपग्रहों का फल । २६. गोचर । २७. सन्यास योग ।